पिछला लगभग पूरा दिन चलते चलते बीता था. और रात काट खाने वाली हवा की सांय सांय के बीच. सुबह के चार बजे थे कि मेरे एक मित्र ने आकर जगा दिया की जल्दी बहर आओ. मुझे लगा कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं हुई. टेंट से बाहर निकला तो सामने निगाहें उठी की उठी रह गयी, घाटी घुप्प अँधेरे से भरी थी और सामने वाले बर्फीले पहाड़ पर पड़ने वाली सूर्य रश्मियों से कारण पहाड़ सोने सा चमक रहा था. सबको जल्दी से जगाया. मैं जनता था की ये दृश्य शायद फिर कही न देखने को मिले, हम में से हर कोई इसे आँखों में कैद करना चाहता था.
वो आज से 30 साल पहले यहाँ तब अपने पति के साथ उनके गुरु जी से आशीर्वाद लेने आई थी. एक हादसे में पति और गुरूजी दोनों ही नहीं रहे. बस वो वापस नहीं गयी. स्थितियां किनी ही बुरी क्यों ना हो. तापमान शून्य से कितना भी नीचे क्यों ना हो. बर्फीली आंधिया चलती हों. वो तब से वही हैं. अपने मूल स्थान बंगाल कभी नहीं गयी. मेरी आँखों के सामने गांधारी, सत्यवती, सीता, उर्मिला, सुलोचना जैसे कितने ही नाम घूम गए. पर सवाल यह कि आज के युग में यह सब? अगला सवाल यह कि "पहाड़ों में ज्यादा स्थिरता है या इस महिला के दृढ़ निश्चय में "?
उसके बाद हमारे गाइड (जिसका नाम हमने मोगली रखा था) ने कहा की यहाँ से तुरंत निकलना पड़ेगा अगर तपोवन पहुंचना है तो. हमने सामान कमर पर लादा और निकल पड़े. 2 घंटे बाद हम वहां खड़े थे जहाँ से गंगा निकलती है. गोमुख. उस स्थान को देखकर या कहूँ कि जी कर मुझे वहां की शीतलता से जो आभास हुआ तो यही लगा कि जिस स्थान के उद्गम स्थान में इतनी शालीनता और इतनी पवित्रता है वही सब कुछ तो आगे दूर तक बहता है. पहाड़ बहुत स्थिर थे. मुझे यही लगा कि नदियाँ इसीलिए बहती हैं क्योंकि उनके जनक पहाड़ स्थिर खड़े हैं. स्थायित्व में बहने का कितना बड़ा दर्शन छिपा है.
हम आगे बढे. पूरा गोमुख ग्लेशियर पार किया. आखिरी चढ़ाई इतनी जयादा मिश्किल थी कि हम सब ने सोचा भी नहीं था. साँस लेने में कठिनाई हो रही थी. एक दुसरे को सहारा देकर उस बरफ और मिटटी के ग्लेशियर को पार किया. ऊपर पहुंचे तो सामने एक बहुत बड़ा मैदान. बीच में बहती एक छोटी सी नदी. मैदान इतना बड़ा था कि वहां पचासों फुटबाल के मैदान बनाये जा सकते थे.
हालत ख़राब थी. एक छोटा सा पेड़ भी कही नहीं. बरफ और मिटटी बस. थोडा आगे जाने पर जीवन के कुछ चिन्ह दिखे. आगे जाकर देखा तो एक बूढी महिला नदी से पानी भर रही थी. मामला समझ में नही आया. 17000 फुट की ऊँचाई पर बूढी महिला. पूछने पर पता चला की वो यही रहती है बिलकुल अकेली. घर के नाम पर एक गुफा और उस गुफा में जीने के लिए जरूरी सामान. जीवन कैसे चलता है तो पता चला कि कभी कभी आने वाले लोग अपने साथ जो लाते हैं वो छोड़ जाते हैं. उसी से जीवन चलता है.
वो आज से 30 साल पहले यहाँ तब अपने पति के साथ उनके गुरु जी से आशीर्वाद लेने आई थी. एक हादसे में पति और गुरूजी दोनों ही नहीं रहे. बस वो वापस नहीं गयी. स्थितियां किनी ही बुरी क्यों ना हो. तापमान शून्य से कितना भी नीचे क्यों ना हो. बर्फीली आंधिया चलती हों. वो तब से वही हैं. अपने मूल स्थान बंगाल कभी नहीं गयी. मेरी आँखों के सामने गांधारी, सत्यवती, सीता, उर्मिला, सुलोचना जैसे कितने ही नाम घूम गए. पर सवाल यह कि आज के युग में यह सब? अगला सवाल यह कि "पहाड़ों में ज्यादा स्थिरता है या इस महिला के दृढ़ निश्चय में "? वहां जितनी देर हम रुके. बस उनसे बात करते रहे. वापस लौट पड़े. मन बार बार वापस मुड़ता रहा - पीछे उनके पास. आँखों में मैं आज जीवन की जिजीविषा की पराकाष्ठा लेकर वापस लौट रहा था. मित्र साथ थे मेरे पर मैं सिर्फ अपने विचारों में साथ चल रही उस महिला के साथ.
मुझे लगा की भारत के अलावा यह कहाँ मिलेगा?



wooo.. U have been to Gomukh.. I went to Gangotri and was willing to visit Gomukh... par lagta hain kismat mein nahi tha..bujurg sath mein they..wonderful view in first pic..
ReplyDeleteA refreshing and enriching experience to share.
ReplyDeleteNice to read :)
And interestingly, papa saw me reading this and he also read so, appreciated, and after reading 4 posts, said me, I'll read rest of the collection later ;)
thnx kapil......
ReplyDeletend uncle ko bhi thanx kahna.. tht u the guys r loving it.
hi
ReplyDeleteNice buddy..
ReplyDeleteyour writing, your thinking and your experience is awsm.
Missing u buddy.
I also wish to visit there.
ReplyDeleteBahut sundar ! dhanyavad hamare sath share karane ke liye.
ReplyDeleteKailas
www.aksharbharati.org
मैं आपके बारे मैं बहुत कुछ कहता हूँ
ReplyDeleteहमेशा
ये सोचे बिना की आप क्या सोचेंगे
या कैसे लगेगा आपको
अब अपने लिखे के कुछ अंश देखिये
.....
मुझे यही लगा कि नदियाँ इसीलिए बहती हैं क्योंकि उनके जनक पहाड़ स्थिर खड़े हैं. स्थायित्व में बहने का कितना बड़ा दर्शन छिपा है.
"पहाड़ों में ज्यादा स्थिरता है या इस महिला के दृढ़ निश्चय में "?
अब इतना अच्छा लिखोगे तो जलन तो होगी ही ना
इसीलिए मैं हमेशा कहता हूँ
की मुझे आपसे जलन होती है
और ये मारी जलन ऐसी है
जो शुकून देती है
आप लिखते रहिये ....
हम जलते रहेंगे .......!
@ kuldeep ji.. apki in baaton me mere liye kitna bada motivation chipa hai .. aap shayad nahi jante.. thnx bhai
ReplyDelete@ dhanyawad kailas ji
हा हा हा हा हा नील भैया .....
ReplyDeleteवैसे मैं ठहरा निरा बुध्धू
जानकारियों का अभाव तो मेरे साथ हमेशा से ही था
और कमाल है आपका
मेरी बातों मैं छिपी बातें भी आपने देख ली
क्या बात
मुझे तो ये भी नही पता था की कुछ छिपा कर दे रहा हूँ आपको
:) :) :)
Wakai yeh par kar bahut acha feel hua.... issa bharat ke siwa shayad hi kahi dekhne ko mile...
ReplyDeletebhaiya its really nice 2 read dis.. amazing. thanx 4 sharing..
ReplyDeleteand i always thought u edited d frst pic.....larger dan life is all i can say for this adventure......
ReplyDeleteआपकी हर तस्वीर से कहानी जुडी है, या कहू कि पूरी कहानी ही तस्वीरो से है. आपकी इस ट्रेकिंग से मुझे नैनीताल के दिन याद आ गए... घनी रात में पहाड़ पर चढाई और ऊपर छोटी पर वो हवा की पवित्रता को महसूस करना...शायद ऐसा ही कुछ आपने अनुभव किया होगा....:))
ReplyDeleteVery Nice narration.
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