रोज़ मर्रा की एक ही तरह की चलती हुई ज़िन्दगी में कभी कभी कुछ ऐसा होता है जो हमें भीतर तक हिला देता है. आश्चर्य, ख़ुशी, दुःख, और बहुत सी कुछ. पूरा पूर्वोत्तर देखते देखते एक सुखद आश्चर्य होता रहा. वहां के हालातों को देखकर दुःख, वहां के लोगों के लिए स्नेह और कई बार सुहानुभूति भी, मैं जनता हूँ कि किसी के प्रति सुहानुभूति दिखने का हक मुझे नहीं है. पर यह बात तब तब समझे में आई जब वहां के लोगों का आतिथ्य, परम्पराएँ और संस्कार बहुत बड़े और पवित्र जान पड़े.
दीमापुर से 8 घंटे सूमो से यात्रा अपने आप में नए नये अनुभवों से भरी थी. हम नागालैंड कि एक सामाजिक कार्यकर्ता अल्फ्रेदा के साथ टेनिंग के लिए निकले थे. यह स्थान परेन जिले में आता है. सड़कों कि हालत इतनी ज्यादा ख़राब थी कि उन्हें सड़क कहना ही शायद गलत था. 8 घंटे का सफ़र हम पांचो मित्रों में से कोई भी नहीं भूल सकता. ख़राब मौसम, रात का अँधेरा, अनजाना रास्ता, अनजाने लोग (वैसे लोग तो वहां शाम के बाद दिखते ही नहीं हैं) और सबसे खतरनाक बात जो हमें बाद में पता चली कि हम नागालैंड के आतंकवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाके में से गुजर रहे थे.
किसी तरह हमने इस खतरनाक वैतरणी को पार किया. हमे एक सामाजिक कार्यकर्ता के घर पहुचना था. आधी रात बीत चुकी थी. जब हम पहुचे. गाँव में अचानक जैसे हल्ला मच गया क्योंकि जिस गाँव में राज्य का कोई सरकारी आदमी तक नहीं आता - वहां दिल्ली से कोई आया है यह तो उनके लिए एक सपने जैसा था. हम उस घर कि रसोई में पहुचे. उस कार्यकर्ता भीम कि माँ ने जिस स्नेह भाव से हमारे सिर पर हाथ फेरा, वो हाथ और आशीष आजतक साथ साथ चलता होगा.
पहाड़ कि छोटी पर बसा यह छोटा सा खूबसूरत गाँव, ठंडी हवाओं के आगोश में था और पूरी तरह से चांदनी में नहाया हुआ. पुरानी ग्रीक कहानियों के किसी स्वप्निल शहर के जैसा. यहाँ न बिजली है न टेलीफोन. न ट्रेफ़िक न धुआं. अच्चा लगा कि यह अनछुआ भारत कितना खूबसूरत कितना अलग है.
अगले दिन सुबह जल्दी ही आँख खुल गयी. बाहर निकलकर देखा तो गाँव रात से भी ज्यादा शांत और सौम्य लगा. भीम हमारे पास आता तब तक मैं अपने के मित्र से साथ जरा गाँव देखने निकल गया. वैसे भी इस जगह के लोग अपनी राज्य भाषा भी नहीं जानते. तो हिंदी और इंग्लिश और बहुत दूर कि बात थी. उनके लिए एक कच्ची छत और पेट भरने भर के लिए मिल जाने कि व्यवस्था. पूरे गाँव में किसी भी घर में कोई दिखावा नहीं और न ही कोई आडम्बर. एक छोटा सा मंदिर जिसमे सूर्य कि पूजा होती है.
अगले दिन सुबह जल्दी ही आँख खुल गयी. बाहर निकलकर देखा तो गाँव रात से भी ज्यादा शांत और सौम्य लगा. भीम हमारे पास आता तब तक मैं अपने के मित्र से साथ जरा गाँव देखने निकल गया. वैसे भी इस जगह के लोग अपनी राज्य भाषा भी नहीं जानते. तो हिंदी और इंग्लिश और बहुत दूर कि बात थी. उनके लिए एक कच्ची छत और पेट भरने भर के लिए मिल जाने कि व्यवस्था. पूरे गाँव में किसी भी घर में कोई दिखावा नहीं और न ही कोई आडम्बर. एक छोटा सा मंदिर जिसमे सूर्य कि पूजा होती है.
वापस आये तो भीम वही खड़ा था. हमारे वह पहुचते ही उसने कहा कि "चलो" मैंने पुछा - कहाँ?
उसने कहा कि गाँव के पुजारी के घर.
गाँव के पुजारी के घर????
इस पर भीम ने जो कहा वो वाक्य प्राचीन भारतीय संस्कृति कि महान परम्पराओं का प्रतिनिधित्व करता है .
उस ने कहा कि गाँव में एक रिवाज़ कि - गाँव में किसी के घर भी कोई भी मेहमान आये उसका पहला भोजन गाँव के पुजारी के घर होता है. इसका मतलब यहाँ कि मेहमान उस व्यक्ति- विशेष का का मेहमान नह इही बल्कि वह पूरे गाँव का मेहमान है.
मैं कुछ देर जस का तस खड़ा रहा. मैं स्तब्ध था. स्तब्ध इसलिए कि अब जहाँ परम्परा जैसे शब्द केवल किताबों में मिलते हैं. वहीँ दूसरी ओर लोग आज भी इन शब्दों को असल में जीते हैं. इस से बेहतर ओर सुखद कुछ और हो ही नहीं सकता था. तो क्या हुआ कि उनके पास भौतिक सुविधाएँ नहीं हैं. भावनाओ के मामले में वे हमसे कहीं ज्यादा अमीर हैं.
मन ही मन में मैंने कहा - वाह.....

ATITHI DEVO BHAV..Waisey India mein abhi bhi yeh chalta hain sun kar bahut acha lagta hain.. Otherwise in Delhi(I m staying here thats y i can say that)... People are staying in big houses but when any guest come they starts saying
ReplyDeleteAthithi Kab Jaogey
पूर्वोत्तर की संस्कृति और सुन्दरता का बहुत ही सुन्दर वर्णन.
ReplyDeleteसड़कें खराब हैं, बिजली नहीं है, बाहर का कोई भी व्यक्ति यहाँ आता नहीं, ये बातें कष्ट देती हैं. कष्ट इसलिए देती है क्योंकि हम इनकी तुलना भारत के अन्य तथाकथित विकसित शहरों से करते हैं. लेकिन ये भी सच है की इन्ही कारणों से इनकी संस्कृति, पवित्रता और विविधता अभी तक बची हुई है.....
ankur bhaiyya..well said.. ye anubhav waha jakar hi kiya ja sakta hai ..
ReplyDelete@ vijay bhaiyya.. aapne sahi kaha.. abhav hain to sab kuch sahej kar rakha hai un logo ne.
anothr gr8 journey xperience.... m tempted 2 visit dese places aftr reading ur blogs.....
ReplyDeletend really v can learn alot frm dese ppl 2 conserve our culture..... 'viksit' nagaro mein to paschim ka 'andha-anukaran' ho rha h..... aur desh ka sbse apekshit varg us sanskriti ko aj b saheje hue h...
मैंने शब्द के इस साधक को अक्सर यात्रा-लोलुप ही देखा है। नील की कविताओं का मैं सदैव प्रशंसक रहा हूँ, और मैं हमेशा इस बात से आश्वस्त भी रहा हूँ कि जब नील पद्य लिखेगा तो उसमें उसकी यायावरी और रचनाधर्मिता, दोनों एक साथ समाहित होंगे। आज अपने इस विश्वास को फलीभूत होते देख सुखद अनुभूत हो रहा है। समझ नहीं आ रहा कि नील पूर्वोत्तर को लिख रहा है या पूर्वोत्तर नील के गद्यकार को…
ReplyDeleteBhaiya Bahut acha laga jaan kar ke aaj bhi aise sanskar aur prem jeevit hain is dharti par....varna metro cities me to pados me kaun rehta hai ye nhi jante log....aur mehmaan aa jaye to baap re baap ghar me hungama....aapke is anubhav ko kaash sab log samjh saken....
ReplyDelete@ chirag ji.. agar ye sach hai to main aabhri hu.
ReplyDeleteबहुत सुन्दर यात्रा वृतांत
ReplyDeleteचिराग जी की बात से सहमत हूँ समझ नहीं आ रहा कि नील पूर्वोत्तर को लिख रहा है या पूर्वोत्तर नील के गद्यकार को…
और आपकी बात मैं सिर्फ इतना जोड़ना चाहता हूँ सबसे खतरनाक बात जो हमें बाद में पता चली कि हम नागालैंड के आतंकवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाके में से गुजर रहे थे......
आतंकवादियों को बाद मैं पता चला होगा की उनसे भी खतरनाक कोई वंहा से गुजरा है ......!
@ kuldeep ji..unhe ye bhi nahi pata hoga ki kitne khatrnaak log is per commnt karenge..
ReplyDeleteHa ha ha ha ha
ReplyDeleteaisa abhi bhi hota hain sunkar aacha laga.....warna yeh sab to bas bachpan main kahaniyo main padha tha....
ReplyDeleteएक सादगी ही तो है जो दिल को सुहाती है, बनावट तो बस आखों को चमकती है. आपकी तारीफ करने के जितने शब्द तो नहीं है मेरे पास, बस इतना ही कहूगा कि आपके जीवन से हम सबको बहुत प्रेरणा मिलती है..इसलिए हमारा मार्गदर्शन करते रहे और खुश रहे.
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