Friday, May 20, 2011

उस पार की नर्मदा



मैंने सूरज को इतनी फुरसत में कभी नहीं देखा था. नदी पर इतना स्थिर और स्वभाव के उलट एक सौम्य सूरज.  नर्मदा के साथ में अनुबंध था उसका. वह नर्मदा को सोना देगा और नर्मदा उसे कई गुना कर घाट पर खड़े लोगों को बाँट देगी. अपने पास कुछ नहीं रखती नर्मदा. नदी में घुलता  सोना, बांटता सोना. यह महेश्वर  है. उस दिन से पहले यह नाम कभी सुनने में नहीं आया था. इंदौर के मेरे कुछ मित्रों ने महेश्वर  जाने की योजना बनाई. मेरा मन इंदौर शहर को जरा ढंग से देखने का था. सच कहूं तो इंदौर शहर के साथ जिस स्ट्रीट फूडिंग का नाम जुड़ा है  - उसे भीतर तक देखना और पढना चाहता था. लेकिन मित्रों के कहने और एक नई जगह को देखने का लोभ संवरण नहीं कर पाया. इतिहास का विद्यार्थी होने के कारण उत्सुकता और बढ़ गयी. हम चल पड़े.  

 
 इंदौर - मुंबई हाई-वे पर इंदौर से 110 किलोमीटर दूर है महेश्वर. सड़क अच्छी थी. पर्यटन  विकास के लिया पहला आयाम - अच्छी सड़कें. अच्चा लगा कि उस अवधारणा पर ध्यान दिया जा रहा है. और हम अपनी उस aarkitype  छवि से बाहर निकल रहे हैं. मध्य भारत का यह  क्षेत्र एक विशेष एतिहासिक महत्व रखता है. विशेषकर 17वीं -18वीं  सदी में मराठों कि अंतर्कलह  और द्वन्द को इसी क्षेत्र की  गवाही मिलती है.
रास्ते भर गेहूं, कपास के खेत साथ साथ चलते रहे. सुमित्रा नंदन पन्त और शरतचंद्र  का भारत. सड़क के दोनों और लोग अपने खेतों में कम ने लगे हैं. सडक पर दौड़ती बड़ी बड़ी गाड़ियों से उन्हें कोई सरोकार नहीं. भारतीय किसान के जिस मेहनतकश paradigm को दुनिया जानती है यहाँ आकर वह paradigm और पुख्ता हो जाता है. 
महेश्वर! मध्य भारत  का गौरव रही अहिल्याबाई होलकर की सात्विक, धार्मिक प्रवृत्ति को प्रतिष्ठित करता है. यहाँ अहिल्याबाई की एक गढ़ी (छोटा किला) और उनके रहने को एक साधारण सी हवेली, गढ़ी के अहाते में बड़े बड़े मंदिर. भारतीय वास्तु के उत्कृष्ट उदहारण. गांधार शैली का प्रभाव. गढ़ी के पिछले द्वार से बहार निकलते ही जो दृश्य आँखों के सामने आता है वह कल्पनातीत था. एक कतार में बाएँ बड़े बड़े घाट, घाटों पर बने शिवलिंग. सामने बहती निश्चल, निर्मल और पवित्र नर्मदा. आँखें ठहर गयी. गति, निरंतरता, सौम्यता और समता का एक सजीव प्रवाह. 
साफ आसमान, मद्धम सूरज, और नीचे जीवटता का हरापन लिए नर्मदा. सामने भरे पुरे धानी खेत. कैसा है यह विचित्र समन्वय? रंगों से रंगा हुआ एक कैनवास. कई बार लगता है यह भ्रम है, माया है , जादू है. जादूगरनी सी खेलती धुप आँखों पर चुभती है पर आँखें सामने देखना  चाहती हैं अपलक. किले की प्राचीर की यवनिका पर किसी ने बहुत फुरसत से यह दृश्य गढ़ा है. लोग आते हिं, शिवलिंगों पर जल चढाते हैं नहाते हैं, नर्मदा को कुछ चढाते हैं. वापस लौटते हैं  तो पीछे मुड़कर नर्मदा को देखते हैं. - आँखों में भरकर ले जा रहे हो नर्मदा. 
नाव वाले हमारे पास आकर खड़े हो गए. वे आपस में लड़ते हैं  झगड़ते हैं. हम एक नए लड़के को बुलाते  हैं जो दूर खड़ा था चुपचाप. शान से नाव पर चढ़ाता है. मनो नाव नहीं उसका राजमहल है . पीछे अहिल्याबाई का महल और यहाँ इस नए लड़के का राजमहल. धार के बीच में नाव. सोचा था उस पार जाकर इस पार को देखेंगे. नया लड़का कहता है - डर ना लगता हो तो कही और ले चलूँ?  डर ? बस आजतक यही तो नहीं सीख पाए. चल पड़े. जल से खेलती सूर्य रश्मियाँ. नहीं समझ में आया की हवा नर्मदा को शीतलता दे रही थी या नर्मदा - हवा को? पौन घंटे ने नाव किनारे लगी. पानी का शोर बढ़ने लगा.  नर्मदा ढलान पर थी. पत्थरों के कारन हजारों धाराएँ फट पड़ी - धाराओं के फटने का यह शोर अच्छा लगता है. जीवन से भरा-पुरा शोर. ऐसा लगा की हम पीछे एक नर्मदा छोड़ आये थे और अब एक नई नर्मदा सामने थी. जो पीछे छूटा वह भी सच था और अभी जो सामने था वह भी सच था. मुझे लगा की हर दिन सच कितने रूपों में हमारे सामने होता है. तटस्थ सच. 
  
हरा रंग दूधिया बन गया, प्रवाह- वेग बन गया. और शांति - शोर में तब्दील हो गयी. अगर कुछ स्थाई था तो निर्मलता, गति और पवित्रता. स्थायी थी तो गति, लक्ष्य.  अरे! नदी में घुलता सोना कहा गया? रश्मियाँ कहा खो गयी? यह कैसा परिवर्तन है?
एक और परिवर्तन हुआ - हमरा मानस परिवर्तन, विचार परिवर्तन. पीछे की नर्मदा के पास बैठकर उस से बतियाने का मन हुआ था. कुछ कहने-सुनने का मन हुआ था. यहाँ नर्मदा की तेज़ धाराओं के बीच से उठते जोश को साथ लेकर बहने का मन हुआ. तेज बहने का मन. घंटो गुजर गए पर  उस दूधिया रंग से मन बहार नहीं निकला. नाव वाला नया लड़का आकर बोला - चलें? अभी मुझे कई फेरे मरने हैं. हम लौट पड़े. नाव गतिमान थी. मन तो उड़ रहा था उसी दूधिया रंग के बीच. बिलकुल बीचो - बीच और बिलकुल मौन.
यह बात उस दिन समझ में आई की वापसी हमेशा मुश्किल होती है और मन की वापसी जयादा मुश्किल. जो पीछे छूट गया सब कुछ साथ- साथ दौड़ता है. हम वापस उसी घाट पर लौट आये. नर्मदा के उस पानी का स्पर्श सुखद था. बहुत सुखद. 
सूरज क्षितिज पर जाकर अटक गया. नर्मदा मुखरित हो उहती थी. सोना पिघलते हुए गरम लोहे में बदलने लगा था और क्षितिज पर बादलों के कोने भभकने लगे थे. और हम तीनो फुरसत में थे. मैं, सूरज और नर्मदा. लौटना तो था ही. घाट से महल के मुख्य द्वार में घुसते ही मैंने वापस नर्मदा को देखा. मन था की नर्मदा को आँखों में भरकर ले जाऊ.  मंदिरों के दर्शन किये.  अहिल्या बाई की हवेली देखी. साधारण लेकिन अभी भी सात्विक तरंगो से सराबोर. मुझे लगा कि बड़े होकर भी साधारण बने रहना ही आपको महान बनाता है.
अहिल्या बाई की हवेली देखी. साधारण लेकिन अभी भी सात्विक तरंगो से सराबोर. मुझे लगा कि बड़े होकर भी साधारण बने रहना ही आपको महान बनाता है. यह महल (मैं उसे महल नहीं कहता - क्योंकि उसमे दिव्यता की आभा थी, विलासिता का प्रभाव नहीं.) आज भी उस महान और विदुषी महिला की स्म्रतियों को समेटे गर्व से माथा उठाये खड़ी हो. 
वापसी में फिर से गाड़ी सडक पर दौड़ने लगी. गेहूं के खेतों के पीछे सूरज एक नारंगी उन के गोले सा उधड़ने लगा. प्रतिपल रंग व शेड्स बदलते रहे. और हर दिन की तरह चला गया - संसार को एक नया सवेरा देने. हम वापस आ गए लेकिन उस पार से इस पास की नर्मदा देखने का मन अभी थी वैसा ही है..

8 comments:

  1. वह नर्मदा को सोना देगा और नर्मदा उसे कई गुना कर घाट पर खड़े लोगों को बाँट देगी.

    GOOD QUOTE :)

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  2. sahi kha bhaiya...

    वापसी हमेशा मुश्किल होती है और मन की वापसी जयादा मुश्किल.

    aesi jagah pe jake tho vapas anne ka kabhi maan hi nahi karta hoga..

    wonderful to read and imagine...absolutely great...

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  3. Bade Hokar Sadharan Bane Rehna hi aapko Mahaan Banata hai... :)

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  4. यह बात उस दिन समझ में आई की वापसी हमेशा मुश्किल होती है और मन की वापसी जयादा मुश्किल. जो पीछे छूट गया सब कुछ साथ- साथ दौड़ता है.

    aap ne aisi baat likh di hai jise koi jhutla nahi sakta, aisa nahi ho sakta ki kisi ne kabhi iska anubhav na kiya ho....

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  5. main logo se alag nahi hu deepu.. main bhi wahi anubhav karta hu jo log karte hian.. yahi koshish kar raha hu ki in anubahvon ko ek jameen de sahoon.. thnx ny way...

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  6. nice.....maheshwar jaane ka man kar gaya...

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  7. क्योंकि उसमे दिव्यता की आभा थी, विलासिता का प्रभाव नहीं. आज भी उस महान और विदुषी महिला की स्म्रतियों को समेटे गर्व से माथा उठाये खड़ी हो.
    गेहूं के खेतों के पीछे सूरज एक नारंगी उन के गोले सा उधड़ने लगा.

    कुदरत के रंगों की तरह, आपकी रचना कितनी पाक है... लिखते रहिये

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