Saturday, May 21, 2011

भौतिकता या संवेदनाएं...


टिहरी बाँध के ऊपर उस चक्क्करदार  सडक पर ड्राइवर ने गाडी रोक दी. गाड़ी से बहर निकलकर उस अथाह जलराशि की बीच कही इशारा कर के उसने कहा कि - वहीँ कहीं उसका गाँव हुआ करता था. वाक्य पूरा करते करते उसकी आँखें नम थी. 
कहानी हम सबको पता है. टिहरी बाँध को हकीक़त की जमीन देने के लिए लाखों लोगों के पैरों की जमीन छीन ली गयी. ना जाने कितनों के सिर के ऊपर का आसमान.
जहाँ तक नज़र उठाओ पानी ही पानी. उसे देखकर मेरी समझ में नहीं आया की यह एक रुकी हुई नदी थी या बहती हुई झील.

कहते हैं युग अंधे होते हैं और शताब्दियाँ बहरी. उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा. युगों ने आँखें मूँद ली होंगी और सदियों ने अपने कानो को हथेलियों से दबा लिया होगा. क्योकि समय की उस भीषण चीत्कार को सुनने  का साहस उनमे नहीं था. आँखें मूंदने वालों को क्या पता की उस दिन जलराशि के नीचे क्या क्या निमग्न हुआ था. न जाने कितने गाँव? ना जाने कितने घर? ना जाने कितने पक्षियों के नीड़? न जाने कितनी शताब्दियों के पदचिन्ह?
उस एक घटना ने कितने सम्बन्ध तोड़े उसका कोई हिसाब नहीं. धरती का जिन रास्तों से, रास्तों का जिन पदचिन्हों से, पदचिन्हों का लकीरों से जो सम्बन्ध टूटा उसका हिसाब कौन देगा? यह सच है की भौतिकतावाद  संवेदनाएं नहीं समझता वह केवल विकास की बात करता है. लेकिन मानव के विकास के लिए मानव का ही दोहन? यह कैसा भौतिकतावाद है. 
उन विस्थापितों को देखकर लगता है कि हर रोज़ बिना दस्तक दिए उग आने वाला सूरज उस दिन के बाद उन लोगों लिए फिर कभी नहीं निकला.
चाँद ने रूककर फिर कभी किसी से बात-चीत नहीं की. घरों पर लिपे पुते संस्कार, न जाने कितनी परम्पराएँ, रीति रिवाज सब कुछ  निमग्न हो गया. 
आज भी हजारों फुट पानी की तहों से न जाने कितने घर इस साफ़ बैंगनी आकाश को देखने की कोशिश करते होंगे. कुछ चूल्हों की राख शायद आज भी गर्म हो. कोई नहीं जनता. 
ये सवाल मेरे अपने नहीं थे. जिन लोगों का सब कुछ पानी के नीचे है ऐसे न जाने कितने सवाल आज भी उनकी आँखों में साफ पढ़े जा सकते हैं. जिनका जवाब कोई नहीं जनता.
एक आदमी है जो रोटी खाता है 
एक आदमी है जो रोटी बेलता है 
एक आदमी है 
जो न रोटी खाता है न रोटी बेलता है 
वह सिर्फ रोटी से खेलता है 
मैं पूछता हूँ यह तीसरा आदमी कौन है 
मेरे इस प्रश्न पर देश की संसद मौन है...
ड्राइवर ने कहा की साहब वे कहते हैं  उन्होंने नया शहर बनाकर दिया है. लेकिन मकान दिए हैं, उनमे घरों की आत्मा का गृह प्रवेश कहा हुआ है. संस्कारों की लिपाई, पुताई कहाँ हुई है? 
हम गाड़ी में जा बैठे. पीछे घूमकर देखा तो मानो पानी के भीतर से उठता हुआ शहर हमें रोकने की कोशिश करता है. की क्या उसकी प्यास  इतनी बड़ी थी की पूरा का पूरा समंदर उस के सिर पर धर दिया. उसका कसूर क्या था?
गुनाहगारों में हम शामिल, गुनाहों से नहीं वाकिफ
सजा तो जान ली हमने खुदा जाने ख़ता क्या थी.. 
प्रश्न केवल भौतिकतावाद की सही उपयोग या दुरूपयोग का नहीं है.  प्रश्न मानवीय सही तरीकों और मानवीय संवेदनाओ का भी है. ये सुलगे सवाल आप सब के लिए भी छोड़ रहा हूँ..

9 comments:

  1. HUM SAB TO टिहरी बाँध KO ENJOY KER RAHE THE,

    AAPNE SE SAB KAB SOCH LIYA.

    REALLY LAGTA HAIN AISA SOCHNE KE LIYE DOBAARA टिहरी बाँध JAANA PADEGA.

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  2. saurabh.. u cant leave the things as they r.. but always there is a lots of more behind. the thing is tht - ki unhe dekhna jarooori hai.

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  3. RUKI HUI NADI YAA BAhti HUI JHEEL..??
    MANAV K VIKAS K LIYE MANAV KA DOHAN..??

    AWESOME LINE..Khuda JAne Ki KhaTA Kya THii..??

    but
    JAwab aapne khud likh diya na bhaiya,,,JAb waqt k pass iska koi jawab na tha K teesra AAdmi kaun hai Jo ROtiyan Khelta hai..Yug AnDhe....Shatbdiyan Bahri...Jawab shayad Manav Khud hai..
    Bhautiktavaad k sath Sanvednayen kabhi nhi jud sakti..

    aur UNNatii hamesha Balidaan magti hai..TEEHRI NE BHI BALIDAAN LIYA...WO bhi bhautik cheejoon ka..

    aur Sanskaar, Sanvednayen, us shar ki rooh ye sawalaat too karegii hai...SAwal bhi MAnav hai Aur JAwab bhi.."Sanvednayeon ki zameen bhi uskii hai aur Bhautiktavad, aur Pragtivaad ki chaht bhi uski hai..wo bhuk bhi aur wo chulhe kii aag BHI>>>

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  4. Bhai kabhi kabhi kuch paney key liye kuch khona bhi padta hain.. aur wahi yahan hua tha..

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  5. नव निर्माण किसी ना किसी विध्वंश के शवों पर ही होता है
    ये नियति को तय करने देते हैं की
    टिहरी विकास का प्रतीक होगा
    या सिर्फ एक शहर एक संस्कृति
    का भग्नावशेष
    '' हाँ ये सच है की भूख लगती है
    रोटियों का जुगाड़ कर प्यारे .....!''

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  6. i loved the last lines.....gunhegaro main hu shamil.........awesome.....my family lived in tehri before i was born and i always used to ask my dad...what d city was about??? he smiled and said....heaven!!!! and i believe so.......

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  7. मुझे ये समझ नहीं आती कि एक इंसान के जीवन का फैसला दूसरा क्यों करता है. क्यों सताधारी कुछ लोग अपने हितो की खातिर किसी की भावनाओ से खेलते है. क्या इस कलयुग में इंसान की भावनाए इतनी सस्ती है? ये कौन सिद्ध करेगा कि जो निर्णय कोई बड़ा व्यक्ति लेता है, वो हमेशा सार्थक हो? क्यों इंसान जो दिखता है, उसी पर यकीन करता है. जो न दिखे वो कुछ है ही नहीं... हजारो सवाल उठते होंगे सबके दिलो में, फिर भी कभी जवाब नहीं ढूँढ़ते हम.. है न नील जी.. ( मैं अपने विचार रख रहा हूँ नील जी, मेरा मकसद आपसे सवाल करना नहीं है)

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  8. कुशल जी
    सत्ताधारियों के प्रति आपके मन मैं बहुत कुछ है
    तो फिर छोडिये विदेश की नोकरी और आ जाएयें
    कुछ करना ज्यादा मुश्किल है भाई
    और हाँ बड़े हमेशा सही नही होते
    लेकिन उन्हें गलत या सही का अनुभव
    जिंदगी ने हम से ज्यादा दिया होता है
    कुछ निर्माण विध्वंश मांगते हैं
    सृष्टि गवाह है
    तरीके अलग और बेहतर हो सकते हैं
    ऐसा मेरा मत है
    आपसे सवाल करना मेरा भी मकसद नही :) :)

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  9. मेँ आपके विचारो से सहमत नही हूँ। मानता हूँ कि बाँध बनने से बहुत से लोगोँ को नुकसान हुआ लेकिन उसके लाभ उससे कही ज्यादा हैँ। अगर आपको उनकी पीड़ा है, तो उनके हक मेँ आवाज उठानी चाहिए न कि बाँध के औचित्य पर सवाल।

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