जगन्नाथ पुरी के पास एक छोटा सा गाँव है - रघुराजपुर. सुना था कि कला के लिए यह गाँव विश्व प्रसिद्द है...
एक बार सोचा की उस गाँव को वह जाकर देखा जाये....
शाम ढल रही थी जब हम उस गाँव में पहुंचे. दूर से ही मंदिर के घंटे कि हल्की हल्की आवाज सुनाई देने लगी. गाँव के बिलकुल बीच में एक छोटा सा साफ, सुथरा मंदिर. मंदिर के चबूतरे पर कुछ बुजुर्ग, कुछ महिलाएं और कुछ बालक. प्रार्थना का एक मीठा एवं सधा हुआ स्वर. सुख, शांति और भक्ति का निस्पंद वातावरण.
पूछने पर गाँव के एक बुजुर्ग ने बताया कि प्रार्थना की यह परंपरा तो ना जाने कितनी पीढ़ियों से चली आ रही है. यह प्रार्थना रोज़ ऐसे ही होती है. प्रार्थना और पीढ़ियों. पुरानी परंपरा जैसे शब्द सुनकर अच्छा लगा. गाँव में छोटे छोटे पुरानी परम्परागत शैली में बने हुए घर. गलियों में खेल रहे बच्चे और नेपथ्य से आ रही मंदिर की घंटी एवं मंजीरे के आवाज़.
एक बार सोचा की उस गाँव को वह जाकर देखा जाये....
शाम ढल रही थी जब हम उस गाँव में पहुंचे. दूर से ही मंदिर के घंटे कि हल्की हल्की आवाज सुनाई देने लगी. गाँव के बिलकुल बीच में एक छोटा सा साफ, सुथरा मंदिर. मंदिर के चबूतरे पर कुछ बुजुर्ग, कुछ महिलाएं और कुछ बालक. प्रार्थना का एक मीठा एवं सधा हुआ स्वर. सुख, शांति और भक्ति का निस्पंद वातावरण.
पूछने पर गाँव के एक बुजुर्ग ने बताया कि प्रार्थना की यह परंपरा तो ना जाने कितनी पीढ़ियों से चली आ रही है. यह प्रार्थना रोज़ ऐसे ही होती है. प्रार्थना और पीढ़ियों. पुरानी परंपरा जैसे शब्द सुनकर अच्छा लगा. गाँव में छोटे छोटे पुरानी परम्परागत शैली में बने हुए घर. गलियों में खेल रहे बच्चे और नेपथ्य से आ रही मंदिर की घंटी एवं मंजीरे के आवाज़.
अँधेरा गहरा होने लगा तभी मेरे एक साथी मित्र ने एक घर की दीवार की और इशारा किया. ध्यान से देखा तो घरों की दीवारों पर बहुत बारीक और सुंदर चित्रकारी थी. एक पूरी दीवार पर भारतीय शास्त्रीय संगीत के रागों पर आधारित पेंटिंग थी. अगले घर की दीवार पर भगवान श्री कृष्ण की पूरी जीवन लीला. अगले घर की दीवारों पर भगवान विष्णु के दशावतार की कहानी का चित्रण. हर दीवार पर कुछ ना कुछ ऐसा था की आँखे ठहरती थी.
रंगों का शानदार प्रयोग, कम इतना बारीक की आँखों पर विश्वास नहीं होता कि इतनी दूर इतने छोटे से गाँव में इतना शानदार काम देखने को मिलेगा..
इसी गाँव में एक छोटा सा गुरुकुल चलाया जाता है . यह स्थान गोत्तिपोआ का जन्म स्थान है .गोत्तिपोआ देशभर में इसी गुरुकुल में सिखाया जाता है. इसी गुरुकुल के संस्थापक श्री मागुनी चरण दास को वर्ष २००४ में ''पदमश्री'' से सम्मानित किया गया .
हम आने वाले थे, हमारे लिए एक विशेष प्रदर्शन गुरुकुल के छात्रों द्वारा किया गया. ओडिसी के परम्परागत वेश में पखावज कि थाप पर सुर, ताल, लय और हाव-भाव का सुंदर प्रदर्शन. योग कि कठिन मुद्राएँ, गोपुरम और टीम-वर्क कि रोंगटे खड़े कर देने वाली प्रस्तुति, लगभग 30 मिनट तक उस गुरुकुल के छोटे बच्चों कि प्रभावशाली प्रस्तुति ने हमें भाव- विभोर कर दिया. सचमुच अतुलनीय. बाद में पता चला कि बालिकाओं के वेश में ये सभी लड़के थे.
अंदर जा कर उनका आवास देखा तो, देखा कि उस घर में कुल तीन कमरे हैं, जिसमे 40 बच्चे और श्री मागुनी चरणदास का परिवार रहता है. सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं, बल्ब कि एक मद्धिम सी रोशनी में अन्य बालक किताबे लाकर स्कूल कि पढाई में जुटे थे.
कला, संस्कृति, और पुरानी परम्पराओं का यह देश, जहाँ अपने ही घर में पल रही प्रतिभाओं को पूछने वाला कोई नहीं. कोई सहायता नहीं. लेकिन फिर भी उन बालकों के चेहरों पर खिलती मुस्कान उनकी निष्ठां और लगन को देखकर लगा कि "साधनों कि कमी हमें रोक ना पाए" बहुत देर तक बच्चों से गपशप होती रही. कुछ कहानियां मैंने बच्चों को सुनाई और फिर से आने और ढेर सारी नई कहानियां सुनाने का वादा करके हमने गुरुकुल छोड़ दिया.
गुरुकुल से बाहर निकलकर कई घरों में गए. एक घर में 60 साल के गोपालदास पेंटिंग बनाने में व्यस्त थे. रोज़ दिन में 15 -16 घंटे पेंटिंग बनाते हैं. उनको एक पेंटिंग बनाने में 3 से 4 महीने लगते हैं, लेकिन तकलीफ यही है कि खरीदने वाला कोई नहीं. फिर भी चेहरे पर ख़ुशी,
संतुष्टि.
अच्छा लगा कि अपनी पुरानी परम्पराओं तथा कलाओं के सहजने,सँवारने वाले हाथ अभी काम कर रहे हैं. लेकिन एक प्रशन मन को कचोटता रहा कि क्या पदम् श्री देकर सरकार का काम पूरा हो गया?
रात होने लगी थी हमने गाँव छोड़ दिया
लेकिन मंदिर कि घंटी बहुत देर तक मन में गूंजती रही...
Neil..
"Paintings kharidney wala koi nahi hain"
ReplyDeletearen't those painting salable? If they are beautiful then i think they are salable..
Agar un paintings key kharidar mil jaye to unki santushti ka level aur badhiya ho jayega..
Yeh to hamari sarkar ki hamesha khasiyat rahi hain Awards dey kar bhulney ki
After reading the description the place sounds full of culture and art...and a place which is still has a conserved indian culture.
ReplyDeleteAll i can say is ki...INDIA ko ATULYA BHARAT aese hi thori khete hai...
thats Incredible India...u r doing great job Bro..to awakening the youth Keep it up..
ReplyDeletefirst time i heard abt tis place raghurajpur....
ReplyDeleteafter readin tis i evn wnt to knw more abt tis place..... tis place jus awesum aftr readin tis.. i wanna c all d wall paintin.... evn heard abt gottipoya per nvr seen wanna see tis..........
every one shud visit tht place.. nd its really owsom.
ReplyDeletejst telling bout dse places wont work, we ol shud do sumthng so dat our cultural heritage dusn't die, btw well described rahul!!!
ReplyDeletei remember wen 1st u told me abt dis village....i was lyk waaooo...its too gudd......i jst wnt 2 visit dis place atlst 4 1ce.....
ReplyDeletend i'll surely will....
nd ya....dis wt incredible india is....or the real india...
gr8888 work bhai......reeli appreciable...keep goin.....all the very best.....:):):)
well said poonam.. really it requers... nd thnx bhvya..
ReplyDeletenice bhaiya,,,, apki writing to hamesha best hoti hai aur hamesha best rahega
ReplyDeleteWow....bhaiya
ReplyDeleteIt's really really nice...!!!!1
India mein aise bahut si places hai aur jahan itna talent hai jiske baare mein hum jaante h nai n u r doing such a greatttttt job...gud luck n keep doing...!!i want 2 visit ths place..
$ yes ths is our "ATULNIYA BHARAT"!!!!!!!@@
kya likhte ho aap...awesome dude....aankho ke saamne picture chalne lagti hai..
ReplyDeletei'm actually out of words nw.....its brilliant, d way u describe things....
ReplyDeleteअगली बार भारत भमण पर जरूर देखूगा, आपका मार्गदर्शन मिलेगा न?
ReplyDeletesure kushal hum sath chalenge....
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