Monday, May 30, 2011

दो आँखे आज भी मेरा पीछा करती हैं.


सुबह सुबह ट्रेन ने रतलाम छोड़ा. मुझे वह से बाँसवाड़ा जाना था. राज्य परिवहन की बस. और मध्य भारत की चिलचिलाती हुई गर्मी. अब तक केवल इस जनजातीय बहुल इलाके के बारे में सिर्फ सुना था. जाने का पहला मौका मिला. बस पूरी भरी थी. जगह तो मिली पर खड़े होने की बैठने की नहीं.
बस ने मध्य प्रदेश की सीमा को छोड़ा और राजस्थान में प्रवेश किया तो सूरज लगभग सिर पर आ पंहुचा था. एक तो गर्मी के कारण हाल बुरा था ऊपर से बस की भीड़. मैं किसी तरह चुपचाप खड़ा था. बस की हालत भी कुछ खास अच्छी नहीं थी. मेरी हालत क्या थी शायद आप समझ पायें.
रास्ते में एक जगह बस रुकी तो मुझे लगा कि शायद बस की छत पर हालत यहाँ बेहतर हो. मैंने ड्राइवर से कहा कि मुझे छत पर बैठने दे. उसने हाँ कर दी. मैं खुश था. बहुत खुश कि शायद खुली हवा में कुछ आराम मिले.. छत पर पंहुचा तो एक बार को यकीन नहीं हुआ. जितने लोग बस में भीतर थे. छत पर उस से कम नही थे. किसी तरह जगह बनाकर मैं बैठ गया.
मुझे सच में नहीं पता था की कुछ आँखे शायद मेरा पीछा कर रही थी. ढुल - मुल चलती बस और भयंकर गर्मी. धरती के सीने से हरा रंग किसी ने चुरा  लिया हो जैसे. बस आँखों में चुभने वाला मटमैला रंग. या कहीं - कहीं कुछ अजीब सा रीतापन जैसे कुछ खो गया हो. बाहर उस रीतेपन  में देखने  का  मन  नहीं होता. पर विकल्प  ही  क्या  है. मन का रीतापन कही देखा नहीं. क्या वो भी ऐसा ही मटमैला होता होगा.

थोड़ी देर बाद एक पतली नीली लकीर सी दिखने लगी थी. नदी होने का अनुमान लगा था पर फिर यह सोचा की यहाँ इस सूखेपन में नदी कहाँ होगी. थोड़ी देर में नदी का होना साफ हो गया. शायद उस क्षेत्र की जीवन रेखा. एक गाँव था छोटा सा, गाँव क्या दो चार घर थे - बस वही रुकी थी. नदी के बिलकुल किनारे. थोड़ी देर रुकेगी यहाँ. 
मैं नीचे उतर गया. कैमरा हाथ में थामे. आदत ही ऐसी है कि बिना किसी से कुछ पूछे नदी की तरफ चल पड़ा. मेरे पीछे कुछ और लोग भी आये. आँखों का एक ऐसा जोड़ा भी जो बस की छत पर चुपके मेरा पूरा मुआयना कर चुका था. 
मेरे लिए  सामने का दृश्य कुछ था भी वैसा ही आह्लादित करने वाला . उस सूखी और बंज़र जमीन के भीतर से यह स्रोत कहाँ से फूटा है. ममता सा निर्मल और प्रार्थना सा पवित्र. उस साफ़ पानी को आसमान कि नीली परछाई ने और गहरा नीला बना दिया था. पानी में गति नहीं थी. एक ठहराव. कई बार यह ठहराव अच्छा लगता है.
 
मैंने कैमरा किनारे रखा. पानी के स्पर्श से खुद को रोक पाना बड़ा मुश्किल था.  मैं एक पत्थर पर खड़ा था . पानी लगभग 3 फुट नीचे था. संभलकर उतरना ही चाहता था की पीछे से किसी ने कहा - पानी बहुत गहरा है. मैंने इतना सुना. पीछे गर्दन घुमाई. वही 2 आँखें. मैं संभल पाता कि पाँव फिसला और मैं कुछ भी समझ पाता - मैं पानी में था. तैरना मुझे बचपन से आता है .. पर उस दिन क्या हुआ मैं नहीं जानता. आँख खुली तो मैं किसी घर में था. पता चला कि पानी बहुत गहरा था और मुझे निकालना पड़ा था. उन लोगों कि माली हालत अच्छी नहीं थी. ये मुझे लग गया था. मेरे लिए जितना उन्होंने किया.मैं वह कर्ज नहीं उतर सकता. मेरे लिए शायद वो एक नया जीवन था. मैं रात वही रुका. क्योंकि मुझे जाने नहीं दिया गया. अगले दिन निकला तो मन एक अनजान कृतज्ञता से भरा था और किवाड़ के पीछे से दो आँखे अभी भी झांक रही थी.. 
उस घटना को सालों बीत गए, इस बात को कोई नहीं जानता. पर वो दो आँखे आज भी मेरा पीछा करती  हैं. मैं जब भी किसी नदी के किनारे होता हूँ  तो मानो कोई पीछे से कहता हो - जरा संभल कर.......


17 comments:

  1. awesome...I can imagine the eyes...appki lekhni mein wo baat hai...baki kaisa laga hoga aapko paani mein girne ke baad heehhaaa that too I can imagine...hehehhah nice one...you are very lucky bro...u r getting all this experience...halanki mai jaanta hoon kee maine yhan lucky bola to per aapke dil mein kya chalta hai...i know that very well....

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  2. i know .. u know btr deepu................

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  3. touching.....galat nahi kehte log aakhir insaan main hi to bhagwaan basta hain jo kab jaane kis ki madad karde.....

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  4. yeh padhne ke baad kuch line yaad agyai...

    from one of my fav songs...

    Standing in the dark...
    i still believe

    someones watching over me..

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  5. this is ur first post tht i just read...
    n blv me i've become ur fan ... all over again :)

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  6. Main bahut der tak sochta raha hoon ki kya comment karun.................
    ......
    ......
    ........
    ..........
    ab nishkarsh ye nikla ki
    es post par main koi comment nhi karunga
    :) :)
    ye apne aap main sampurna hai

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  7. बिना कुछ कहे भी सब कह देती है आखें. चाहे प्यार का इज़हार हो या नफरत का सागर, आखें हर बात कहती है. आपसे ज्यादा ख़ामोशी को कौन समझ सकता है नील जी..??

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  8. baat aankhon bhar ki nahi hai kushal baat to unme tairte jajbaaton ki hai..

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  9. Yeh kab ki baat hain , U never shared it with us previously.

    The best line was"
    धरती के सीने से हरा रंग किसी ने चुरा लिया हो जैसे"

    Waise pics bhi aapne click kari hain/ blog me upload kari hai.
    really owesome and matching the content

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  10. cant say waoo..Bhaiya hmm but wo ankhen aajkal hai kahan..??

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  11. "MAMTA jaisi NIRMALTA, and PRARTHNA jaisi PAVITRATA"... splendid explination....

    Admirable...!!!..
    sare artical padhlunga na to mejhe sare adjectives 3-4 bar repat karne padenge...!!!

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  12. sahi baat rishit....
    visheshanon ka bahut hi sundar upyog kiya gaya hai

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  13. waah bhaiya...kitna accha likha hai.....sochne pe majboor kar diya

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  14. धरती के सीने से हरा रंग किसी ने चुरा लिया हो जैसे. बस आँखों में चुभने वाला मटमैला रंग... waah bhaiya waah

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  15. पता नही पर क्योँ मुझे आपकी बातोँ पर विश्वास नही हो रहा हैँ। क्या यह सत्य घटना है ? आप ही जाने। पर हाँ उस दिन वो दो आखेँ नही होती तो आज हमारे पास ये दो आखोँ (आपकी) नही होती।

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