
बैजनाथ से लगभग 20 किलोमीटर खीर गंगा के किनारे बने हुए एक सरकारी गेस्ट हाउस ने हम रुके थे. सुबह सुबह अभी सूरज ने किरणों का पिटारा खोला नहीं था की हम लोगों ने वो सरकारी गेस्ट हाउस छोड़ दिया. कल शाम आसपास के लोगों से जो बात हुई थी. उस के आधार पर तय था की उस जगह पहुंचना था जिसे लोग तुरुंडा कहते थे. बस सामने के पहाड़ के पीछे वाले पहाड़ पर कुछ है. क्या है? यही देखना था.
मुझे लगता है की प्रकृति का मौन निमंत्रण हमेशा एक चुनौती ही होता है. उसे स्वीकार करो - फिर देखो प्रकृति खुले मन से आपका स्वागत करती है. हमने उस मौन को सुना. चल पड़े उस निमंत्रण पर जिसका कोई ओर - छोर नहीं था.
चढ़ाई शुरू हुई. जोश से लबालब हम चलते रहे. हमने आधे से ज्यादा पहाड़ चढ़ लिया था. अचानक पिछले पहाड़ के पीछे से काले काले बादलों ने कब धावा बोला पता ही नहीं चला. तेज हवा के साथ अचानक तेज बारिश शुरू हो गयी.
आसमान फट पड़ा था जैसे. यह सब कुछ इतनी तेजी के साथ हुआ था की कुछ भी समझ में नहीं आया. उस दिन यह कहावत सच लगी की एक बार को मौत के आने की आहट सुनी भी जा सकती है पर पहाड़ की बारिश का कोई भरोसा नहीं.
पूरा पहाड़ जैसे अचानक काले बादलों के आगोश में था. यह सब इतना जल्दी हुआ था की कुछ भी नहीं सूझ रहा था. सब इधर उधर भागने लगे. कोई ऐसा पेड़ नहीं, कोई चट्टान नहीं की जिसका सहारा मिल सके. हमें अपनी कोई चिंता नहीं थी. चिंता थी तो साथ लाये हुए सामान की, कैमरा, घड़ियाँ, मोबाईल और कुछ और.. क्योंकि आगे की कई दिन की यात्रा इन पर बहुत हद तक निर्भर थी.
एक दो साथी पहले ही आगे निकल चुके थे. उनकी भी चिंता हो रही थी. हमे पता था की आसपास कोई आबादी नहीं है तो चिंता होना स्वाभाविक था.
तभी कही दूर से किसी के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी. बहुत हल्की सी. समझ में नहीं आया की माज़रा क्या है. उपर की तरफ देखा तो एक साथी हाथ हिलाकर हमें उपर आने का इशारा कर रहा था. उसके साथ २ और लोग थे. कहीं कुछ गड़बड़ न हुई हो ये सोचकर हम सब सामान उठाये बारिश और हवा की चिंता किये बिना भाग पड़े. रास्ता और मुश्किल हो गया था. फिर भी साथियों की चिंता..
उसके पास पहुचने पर पता चला कि थोड़ी और ऊंचाई पर एक झोपडी दिख रही है. वहां पहुंचकर शायद बचाव हो सके. हम बढ़ चले. झोपडी तक पहुचे. तब तक बारिश और तेज हो गयी थी. झोपडी के आहते में 5 छोटी छोटी बकरियां बंधी थी. कोई है क्या भीतर? भीतर से कोई आवाज नहीं आई. दोबारा आवाज दी तो एक बूढा आदमी बाहर निकला. हम बताने लगे की इस तरह तुरुंडा के लिए निकले थे...बूढा बोला की पहले भीतर आ जाओ बाद में सब बताना. अंदर गए तो देखा कि एक बूढी महिला भी थी.
मन मान ही नहीं रहा था कि हम वह रुकें. या बारिश रुकने का इंतज़ार करें. पर सामान की चिंता थी. बूढ़े ने हमारी समस्या का समाधान कर दिया. बोला कि चिंता मत करो. सामान यही छोड़ दो. वापसी में ले लेना. मन मान नही रहा था पर क्या करते क्योंकि पूरे ग्रुप में कोई भी वह रुकने को तैयार नहीं था. यही तय हुआ कि एक रिस्क लेकर देखते हैं.. सामान पचासों हज़ार से ज्यादा का था. फिर भी. तुरुंडा देखने के लिए हम यह कीमत चुकाने को तैयार हो गए, सामान छोड़ दिया.
ऊपर लगभग दो घंटे कि चढ़ाई. तब तक बारिश रुक गयी थी. सूरज ने भी बादलों के बीच अपना ठांव ढूढ़ लिया था.
तुरुंडा सच में बेहद खूबसूरत था. (दो पहाड़ों के बीच में एक तश्तरीनुमा घास का बड़ा सा मैदान.) वापस हो लिए. कई बार लगता है कि आदमी मन का गुलाम नहीं है बल्कि कितने ही मौकों पर मन को आदमी के सामने विवश होना पड़ता है. यही हुआ. मन वापसी नहीं चाहता था उस खूबसूरत हरे रंग के कैनवास से. पर क्या करें?
मन तो सामान पर भी अटका था कि सामान का जाने क्या होगा. तेजी से नीचे की तरफ लौट पड़े. जितनी तेज लौट सकते थे.
झोपडी के बाहर का नजारा देखने लायक था - हम सबने जो भी गीला सामान वहां छोड़ा था वो सब धूप में फैला हुआ था. यहाँ तक की कीचड़ लगे कपड़ों को अच्छे से धो कर धूप में फैला दिया गया था. पूरा सामान व्यवस्थित रखा था. और वे दोनों बुजुर्ग खरबूजे जैसा कोई जंगली फल काटने में व्यस्त थे. गीली अंगीठी पर पतीला चढ़ा था चाय के लिए. पता नहीं शायद भगवन ने हमारे विश्वास की परीक्षा ली थी या हमें एक सीख दी थी की बिना मतलब अविश्वास मत करो.
वो जंगली फल स्वाद में थोडा खट्टा था. पर उस खट्टेपन की मिठास बहुत रसभरी थी. उस दिन मुझे लगा की क्यों राम ने शबरी के बेर खाए थे. क्यों कृष्ण ने विदुर के घर साग खाया था. उन्हें पता होगा की वनों और अभावों में रहने वालों के पास विश्वास की अमूल्य निधि रहती है..
वापसी में प्रकृति बहतु मुखरित थी और हम बहुत मौन..




nice one bhiaya.....i reminded me of a story i read...."The old man and his god"....bas farq itna hain ki yeh jyada aache se mann ko chooti hain......
ReplyDeleteomg....thnx ny way tushar..very first commnt jo man ko baht bheetr tak choota hai..
ReplyDeletesach hai jab bhi ham musibat main hote hai bhagwan kisi na kisi ruap main aa hi jata hai
ReplyDeleteagain gud one ............no any line.............. God help all
ReplyDeleteभाई कई बार लगता है की
ReplyDeleteये सब आपके साथ ही क्यूँ होता है ?
अच्छी यात्रा
अच्छे लोग
अच्छे नज़ारे
उस पर
ये अच्छे अच्छे लेख
हम सब से अच्छे अनुभव साझा करना
कोई तो है जिसने
अन्छूवे भारत
अनदेखे भारत
अनमीले भारतीय
अनजाने रस्ते
अनमोल यादें
अविस्मर्णीय पलो को
हमारे साथ बाटने का ठेका दिया है आपको
सही काम कर रहे हो
यूँ ही करते रहो
'' भावनाओ के ठेकेदार ''
baantna hi hai to kyo na achhca hi baantoon bas isliye. hi
ReplyDeleteor fir aap jaise achche log sath hain to sab kuch achcha hi hota hai mere sath...dhanywad..
@ thnx mangat..
वाह रे भोले शंकर
ReplyDeleteविष खुद और अमृत दुनिया को
बाटना ही है तो क्यूँ ना अच्छा बाटूँ
बढ़िया है
वैसे भाई
मैंने भी आपके साथ यात्रा की है
और दावा है
की उनकी स्मृतिया जेहन मैं होंगी जरूर
लेकिन यकीनन सुखद नहीं ....
हा हा हा हा हा
कुलदीप आजाद .....:) :)
kuldeep ji..yad kro..is yatra me b aap sath the...bas chook gye the is anubhav se..kuch yad aaya?
ReplyDeleteMain bachchha rahaa hounga
ReplyDeletekyunki mujhe to kuch yaad nhi sirji
:) :) :)
jesa kuldeep bhaiya ne kha....
ReplyDeleteभाई कई बार लगता है की
ये सब आपके साथ ही क्यूँ होता है ?
अच्छी यात्रा
अच्छे लोग
अच्छे नज़ारे
उस पर
ये अच्छे अच्छे लेख
हम सब से अच्छे अनुभव साझा करना
कोई तो है जिसने
अन्छूवे भारत
अनदेखे भारत
अनमीले भारतीय
अनजाने रस्ते
अनमोल यादें
अविस्मर्णीय पलो को
हमारे साथ बाटने का ठेका दिया है आपको
सही काम कर रहे हो
यूँ ही करते रहो
'' भावनाओ के ठेकेदार '
definately....aap pe reposibility hai..
aapne writing ke through sabh vo dhikha aur realise karna ..jo sayad hum nahi dhek pate hai....
मन वापसी नहीं चाहता था उस खूबसूरत हरे रंग के कैनवास से.
my fav line ...
not just for just this but for all the other experience u shared ......after reading them all, it feels that its a painting on a canvas...and a very beautiful one...
thnx a lot dhruva.. so sweet of u.. nd make ma more motiveted.. thnx
ReplyDeleteawesome.....
ReplyDeleteमैंने आधा सुना है आपका ये अनुभव पहले, लेकिन आपकी कलम से पढने का मज़ा ही कुछ और है. हर बार मन करता है कि," काश! थोडा और लिख देते, तो थोडा और दूर निकल जाता में अपने ख्यालो संग". ये उत्सुकता बनाये रखिये..:))
ReplyDeletekya kar sakta hoon mitra.. bahut sari bdhytayen sath chalti hain. fir bhi koshish karoong ki jo b mere pas hai use bantta chalu..
ReplyDelete@ Druva - Thank u sis............:) :)
ReplyDeleteNeeeel ji......
ReplyDeleteU r fountain head of Knowledge & creativity...
Sunil Anna