Saturday, May 28, 2011

हम लोग भूखे नहीं सोये


हमेशा की तरह बस निकल पड़े बिना तय किये की जाना कहाँ है. देहरादून से निकले केवल इतना तय किया कि आज कि रात कर्ण प्रयाग (जहाँ अलकनंदा और मन्दाकिनी नदियों का संगम होता है.) रुकेंगे और फिर कल तय करेंगे कि केदारनाथ, बद्रीनाथ, आदि बद्री, हेमकुंड साहिब, फूलों की घाटी या फिर औली कहाँ जाना है. सबके अपने अपने मत थे क्योंकि सब नए रास्ते पर जाना चाहते थे. आदमी है ना, मन के आगे उसकी नहीं चलती. 
देहरादून से एक जीप पकड़ी. और निकल पड़े एक अनजाने सफ़र पर बिना ये फिक्र किये कि आगे होगा क्या.
उस पूरे रास्ते को केवल खूबसूरत कहना शायद बेमानी होगी. और इस से बेहतर कोई शब्द मेरे पास है नहीं. रास्ता सच में बहुत खूबसूरत था. अलकनंदा के किनारे किनारे बहुत कुछ ऐसा मिलता है कि ठंडी हवाओं के बीच भी आप सिर्फ बाहर देखते हैं. अनवरत. आप बहुत सारे लोगों के साथ होते हुए भी सिर्फ अपने साथ होते हैं. अपने ही भीतर गहरे और गहरे. तुलना घाटियों कि गहराइयों और पर्वतों की ऊंचाइयों के साथ अपने आप चलती है. रुद्रप्रयाग, श्रीनगर जैसे स्थान पीछे छूटते रहे. कोई गिनती नहीं कि कितने ऐसे नज़ारे जिन्हें देखकर यही गुमान होता है कि यही सबसे खूबसूरत है और अगले ही पल यह भ्रम टूट जाता है. क्योंकि अगले ही मोड़ पर कुछ और ज्यादा सुंदर.
जुलाई का महीना, आसमान बादलों से भरा था. हलकी हलकी बारिश शुरू हो गयी. ठण्ड कि हल्की सी चादर ने हमें घेर लिया. पर मन था कि खिड़की के बाहर ही अटका था. किसी पहाड़ कि चोटी पर. लेकिन साथियों कि हल्की - फुल्की बातों ने माहौल को काफी हल्का कर रखा था.
 रास्ते में जीप का ख़राब होना. वह दृश्य मुझे लिखते वक़्त ऐसा लग रहा है जैसा किसी फ़िल्मी पटकथा में होता है. इन 2 घंटों से कोई बहुत विशेष फर्क तो नहीं पड़ा. हाँ हम नियत समय से लेट जरूर हो गए.
हम कर्ण प्रयाग पहुचे तो रात काफी बीत चुकी थी. पहाड़ों में रहने वालों कि रात और सुबह वैसे भी जल्दी ही होती है. शहर सोया पड़ा था. मानो मुनादी करवाकर सोया हो कि आज उसे कोई ना जगाये. कहीं कहीं थोड़ी बहुत रोशनी के शेड्स दिख रहे थे. जीप वाले ड्राइवर कि मदद से एक होटल तो मिला. भूख सभी को लगी थी. दिन में खाना नहीं खाया था तो सभी का हाल बुरा था. 
इतनी रात खाने कि व्यवस्था! होटल वाले ने साफ मना कर दिया. यहाँ तक कि चाय भी नहीं. सबके चेहरों पर बड़े बड़े प्रश्न चिन्ह. एक ही उपाय था कि सामने बह रही गंगा का पानी पियो और रात बिताओ. मेरी एक साथी ने मुझसे कहा कि चलो कुछ रास्ता ढूँढने कि कोशिश करते हैं. हम दोनों होटल से निकल गए. थोडा आगे जाकर एक ढलान पर एक घर में मद्धिम सी रोशनी दिखी. (घर इसलिए लगा क्योंकि अंदर से किसी छोटे बच्चे से रोने कि आवाज आ रही थी.) अपर्णा (सहयात्री) ने जाकर दरवाजा खटखटा दिया. मैं सच में डर गया था कि कहीं कुछ गड़बड़ ना हो जाये. अनजाना शहर, अनजाने लोग. दरवाजा खुला. एक महिला ने दरवाजा खोला. उम्र यही कोई 24 -25 साल. (मुझे उस हल्की रोशनी में जितना दिखा).
बहुत नम्रता से पुछा कि क्या बात है. मैंने जो भी यथा स्थिति थी उनके सामने रख दी. वो कुछ देर दरवाजे पर मूर्तिवत खड़ी रही. बोली अंदर आ जाओ.  
आप दोंनो इतनी रात? 
अपर्णा ने कहा कि भाभी हम दो नहीं 5 लोग हैं. और सभी भूखे हैं. अपर्णा ने कह तो दिया पर आगे क्या होगा पता नहीं था.  
उस रात हम लोग भूखे नहीं सोये, हमने चाय भी पी. आज भी जब हम सब मित्र उस रात को याद करते हैं. तो मन एक पवित्र भाव से भर जाता है. अकेली महिला ने हमारे लिए नाश्ता बनाया, मैं और मेरी साथी उस बच्चे के साथ खेलते रहे. आज भी उस बच्चे कि किलकारी कानो में जस कि तस पड़ी हैं. मुझे गर्व होता है कि यायावरों की परंपरा वाले इस देश में आपको आश्रय देने वालों की कोई कमी नहीं.


13 comments:

  1. Wow nice one Bro...

    ReplyDelete
  2. very nice bhaiya........amazing lines and beautiful journey......:-)

    ReplyDelete
  3. bahut aacha bhaiya....laga hi nahi ki padh raha huin.....laga waha par khud maujood huin....

    ReplyDelete
  4. yeh kis trip ki baat hai, bhiaya

    ReplyDelete
  5. well...you are an amazing writer bhaiya..!!

    ReplyDelete
  6. wahi baat sarthak hoti hain.. Atithi Devo Bhav

    ReplyDelete
  7. amazing...n aisa sirf india mein h ho skta hai...even hota hai.!!!

    ReplyDelete
  8. अच्छा लेख
    मजा आ गया
    और ये भी यकीन हो गया की
    दुनिया मैं भिखारी और
    आप ये दोनों कभी भी कंही भी भूखे नहीं सोओगे
    सॉरी :) :) :)

    ReplyDelete
  9. this makes me believe in humanity again.......hindi me likha isliye jayada relate kar paye !!

    ReplyDelete
  10. ऐसा ही कुछ महसूस विदेश में होता है नील जी, जब रात को २ बजे कोई घर आता है काम से और खाना रसोई में बनाकर रखा होता है. कोई किसी का सगा संबंदी नहीं, बस एक प्यार है जो एक दूसरे को साथ रखता है, हर हालात में, हर बात में.......

    ReplyDelete
  11. DEVBHUMI me jakar aap bhukhe rahen esa ho hi nahi sakta..

    yahi to khasiyat hai devibhumi - UTTRANCHAL ki

    ReplyDelete
  12. waah..aisi pawan dharti pe jaane ka soubhagya kisi kisi ko milta hai...... n very well written...you are a great soul

    ReplyDelete
  13. नील भैया आप जहाँ जाते बच्चोँ को पहले सम्मोहित कर लेते हैँ। आखिर सूर्या के ट्रेनर जो ठहरे।नील भैया आप जहाँ जाते बच्चोँ को पहले सम्मोहित कर लेते हैँ। आखिर सूर्या के ट्रेनर जो ठहरे।

    ReplyDelete