बात 4 साल पुरानी है. पूर्वोत्तर में दूसरी बार और अरुणाचल प्रदेश में पहली बार जाने के मौका मिला. पता चला कि भारत के सबसे पूर्वी जिला लोहित. और उसमे भी रोइंग जाना है.(रोइंग से आगे मुस्मि hills शुरू हो जाती हैं, और भी चीन. यहाँ वह स्थान है जहाँ ब्रह्मपुत्र की सबसे बड़ी सहायक नदी लोहित ब्रह्पुत्र में मिलती है.)

मुझे सुनकर बिलकुल ऐसा ही लगा था जैसा इस वक़्त आपको लग रहा है कि वहां जाना कितना रोमांचक होगा. खैर. 52 घंटे की रेल यात्रा (तिनसुकिया तक) जिसे रस्ते भर पड़ने वाली बारिश और दीमापुर (नागालैंड) से आगे के रेल के सिंगल ट्रैक ने और मजेदार और खूबसूरत बना दिया था. तिनसुकिया पहुंचे तो रात घिर चुकी थी. विवेकानंद केंद्र के एक स्कूल में रात बिताई. रात - रात भर बरसती रही. हवा बादलों के साथ लडती रही और हम सुबह शुरू होने वाले एक अनजाने लेकिन रोमांचक सफ़र से बे-खबर सोते रहे.

मुझे सुनकर बिलकुल ऐसा ही लगा था जैसा इस वक़्त आपको लग रहा है कि वहां जाना कितना रोमांचक होगा. खैर. 52 घंटे की रेल यात्रा (तिनसुकिया तक) जिसे रस्ते भर पड़ने वाली बारिश और दीमापुर (नागालैंड) से आगे के रेल के सिंगल ट्रैक ने और मजेदार और खूबसूरत बना दिया था. तिनसुकिया पहुंचे तो रात घिर चुकी थी. विवेकानंद केंद्र के एक स्कूल में रात बिताई. रात - रात भर बरसती रही. हवा बादलों के साथ लडती रही और हम सुबह शुरू होने वाले एक अनजाने लेकिन रोमांचक सफ़र से बे-खबर सोते रहे.
सुबह उठे. स्कूल की बस में बैठे और चल पड़े. आसमान अभी भी बरस रहा था. लगभग तीन घंटे के सफ़र के बाद हम ब्रह्मपुत्र के किनारे खड़े थे. सामने उफनती हुई नदी, जिसका कोई छोर नहीं. दूसरा किनारा काले बादलों में कहीं खो गया था. उस दिन ध्यान में आया कि क्यों ब्रह्मपुत्र को नद कहा जाता है नदी नहीं.
उस पार जाना है. लेकिन जाना कैसे है? दूर दूर तक कोई पुल नहीं, कोई और रास्ता नहीं. फिर? इसी बीच एक फेरी(एक बड़ी सी चपटी नाव) किनारे आ लगी. जिस पर पहले से ही आसाम ट्रांसपोर्ट कि एक बस खड़ी थी. उसके पीछे हमारी बस भी फेरी पर चढ़ा दी गयी. हम हतप्रभ से खड़े देख रहे थे कि यह हो क्या रहा है. हमारे साथ विवेकानंद केंद्र के एक कार्यकर्ता थे. उन्होंने बताया कि उस पार जाने का यही एक साधन है. आसाम और अरुणाचल प्रदेश की सरकारों के बीच यह तय नहीं हो पा रहा है की पुल कौन बनवाए. जबकि रोज़ सैकड़ों लोग उस पार से इस पार और इस पार से उस पार जाते हैं. हम किसी तरह डरते डरते फेरी पर चढ़े. और फिर चुप चाप बस में अपनी अपनी सीट पर जा बैठे. ये कैसा अनोखा सफ़र था. नदी में नाव, नाव पर बस और बस में हम. वो भी जब जबकि नदी में बाढ़ आई हुई हो. फेरी चल पड़ी. मैं अपने एक साथी के साथ बस से बाहर आ गया. हल्की हल्की बारिश और खुली हवा, नीचे पूरे वेग से बहती हुई ब्रह्मपुत्र. जैसे एक निमंत्रण हो कि गति, वेग, चपलता अगर सीखनी है तो मुझसे सीखो.
फेरी वालों ने चाय का इंतजाम कर रखा था. इस से बेहतर और क्या हो सकता है. हवा, बारिश, नदी, फेरी और चाय....
डेढ़ घंटे का सफ़र. उस पार पहुंचे. हम उतरे, बस उतरी, फेरी वाले ने पैसे लिए और फेरी वापस. मैं दूर तक उस फेरी जो जाते देखता रहा. जब तक वो दूर बादलों में खो न गयी. बस चल पड़ी. मुश्किल से 1 किलोमीटर चले थे कि एक जगह बस फंस गयी. उतरो! धक्का लगाओ.. और हो भी क्या सकता था. लेकिन इसके बाद तो बस का फंसना और निकलना - एक सिलसिला सा चल पड़ा. हम 7 लोग और इतनी बड़ी बस.
ब्रह्मपुत्र का यह किनारा दल दल से भरा था. एक जगह हमारी हिम्मत जवाब दे गयी. एक ही जगह फंसे हुए 2 घंटे हो गये. सूरज बहुत तेजी से क्षितिज की तरफ भाग रहा था. और हम अभी सड़क से बहतु दूर थे. समझ में नहीं आ रह था कि क्या करे. कोई नहीं था जिसे मदद के लिए बुला सकें. कई बार भगवान हम ये बताने कि कोशिश करता है कि उसकी बिछाई हुई बिसातों से सामने हमारी हर चाल बहुत छोटी होती है.
अचानक 6 महिलाओं का एक ग्रुप सिर पर लकड़ियों का बोझा रखे उधर से गुजरा. हमें देखकर रुके. सामने सब कुछ बहुत साफ था. हमारी हालत देखकर शायद उन्हें अनुमान लग गया कि क्या करना है. हम से से कोई भी उनकी भाषा का एक शब्द भी नहीं जनता था. न ही हमने उनसे कुछ कहा, उन्होंने रस्सी, लकड़ियों, कि सहायता से हमारा साथ देना शुरू किया. पूरे मन से ये लोग हमारे साथ जुट गए. बात करती जाती, हंसती जाती और बस को बाहर निकालने कि कोशिश. लगभग 45 मिनट, हमारी बस दल दल से बाहर.
समझ में नहीं आया कि किस तरह उनका आभार प्रकट करें. हमारे साथ के उस कार्यकर्ता ने जेब से कुछ पैसे निकल कर देने चाहे . उन्होंने दोनों हाथ जोड़ दिए. अपना अपना लकड़ियों का गठ्ठर सिर पर उठाया, मुड़कर एक मुस्कान दी और चल पड़ी.
हमारी बस भी चल पड़ी थी. मैंने उन्हें जाते देखा. तो समझ में नहीं आया कि ब्रह्मपुत्र कि उस फेरी और यहाँ इस वैतरणी के इन तारणहारों में किसकी भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण थी.
7 घंटे बाद हम रोइंग पहुचे. एक और घुप्प अँधेरी रात, थकान. पर बस से बाहर निकलते ही ठंडी हवा ने जब छुआ तो लगा कि अब और कुछ नहीं चाहिए.....

the way you write ... you take us all right there with you, feeling wat you felt, experiencing wat u experienced ... loving the blog, please include some of your beautiful poems too ... pls pls
ReplyDeleteYou are so lucky Rahul.
ReplyDeleteHws exciting trip. The far eastern part of India.
Natural beauty where sky meets with mountain.
I always wish to see.
Yes Aman is rite.
ReplyDeleteyour some poem also should be here.
M missing ur poem.
grt once again,
ReplyDeletesach mian agar koi prvotar bharat ki baat karta hai to lagta hai ki wo india ka na hokar kisi or dhesh ka hissa hoo,apna hokar bhi hamne kitna paraya banaya huaa hai,fhir bhi unke mann main hamare liye koi gile-sikwe nhi hai,bas pyar or apnapan hai.hamri govt ye baat kub samjhege.
or ek china hai jo ye hissa hadpne k leye har samay teyar hai.
great great great............. no any more words for this one...
ReplyDeletesimply amazing...!!!!!
ReplyDeleteरात - रात भर बरसती रही. हवा बादलों के साथ लडती रही और हम सुबह शुरू होने वाले एक अनजाने लेकिन रोमांचक सफ़र से बे-खबर सोते रहे.
ReplyDeleteहल्की हल्की बारिश और खुली हवा, नीचे पूरे वेग से बहती हुई ब्रह्मपुत्र. जैसे एक निमंत्रण हो कि गति, वेग, चपलता अगर सीखनी है तो मुझसे सीखो.
कई बार भगवान हम ये बताने कि कोशिश करता है कि उसकी बिछाई हुई बिसातों से सामने हमारी हर चाल बहुत छोटी होती है.
आप ये सब लिखते हो
और हम सिर्फ ये सोचते हैं कोई कैसे
ये सब लिख लेता होगा ...
फिर मुझे लगता है ....
हमारी नियति ने हमें ये सोभाग्य दिया होगा
की यात्रा करना और उसका साक्षात् वर्णन करना
आपकी नि ......यति हो जाये .....!
simply great neel I have also exprience the same in north east. but dont have such beautiful words to explain it like you have.
ReplyDeleteपूर्वोत्तर की प्राकृतिक सुन्दरता जितना लुभाती है उतनी ही दुर्गम भी है...यद्यपि वहां की सुन्दरता और प्राकृतिक सुषमा का अनुभव सभी कर तो सकते है पार उनको शब्दों में व्यक्त कर पाना सब के बस की बात नहीं ,भाषा और शब्द कई बार भावों के आगे बौने हो जाते है ये रचनाकार की क्षमता पर निर्भर करता है की वो इनके द्वारा उन भावों को कहाँ तक व्यक्त कर पाता है |
ReplyDeleteसुन्दर यात्रा वर्णन है .....पठनीय और सराहनीय |
नदी में नाव, नाव में बस, बस में हम...
ReplyDelete...और फिर हमारे मन में पूरे उद्वेग से बहती हुई कल्पनाओं की नदी, विचारों की नदी.
ये मन की नदी कभी टकराती है उस आश्चर्य से कि उन अनजान महिलाओं ने हमें परेशानी में देख कर अपना रास्ता क्यों नहीं बदल लिया, जैसा कि मेरे रिश्तेदार किया करते हैं जब उन्हें लगता है कि 'शायद' मैं उनसे कोई सहायता मांगूंगा
क्यों न उन लोगों ने मदद करने से पहले हमारी मजबूरी का फायदा उठाकर कुछ मांग की. जैसा की तथाकथित सभ्य और शिक्षित समाज में बस की हड़ताल होने पर auto rickshaw वाले करते हैं. या Air India की हड़ताल होने पर private airlines के highly educated managers अपने किराए बढ़ा लेते हैं.
मेरे मन की नदी रास्ते में पड़ने वाले इन अनुभवों के पत्थरों से टकराती है और मुझसे पूछती है: कौन शिक्षित है, कौन सभ्य है....
vijay bhaiyyya.. aapke ye sarea sawal bahut sarthak hain..or sahi bhi.. aap hamesha sahi kahte hain ki ab samay aa gaya hai ki in sawalon ki uthaya jaye.. nd thnx
ReplyDeletemain sirf ek bolg padhe aaya tha............ab saare dobara padh kar hi uthunga.....d way u write is awesome....
ReplyDeleteमेरा सपना है पूरा पूर्वोतर घूमने का और आपका मार्गदर्शन चाहूगा जब भी मौका मिला... बहुत खूबसूरत चित्रण करते है अपने शब्दों से नील भैया, मुझे भी सीखा दीजिये ऐसा कुछ...
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