Friday, June 17, 2011

राख भरी उन हथेलियों से सामना ना हो जाये...


एक दिन और गुजर जाने पर आप उस दिन पर फ़क्र कर सकते हैं कि बीते हुए लम्हों को आपने वैसे जिया जैसा आप जीना चाहते थे. वो दिन आपकी जिंदगी के सीने पर एक कभी भी न मिटने वाली इबादत की तरह जड़ा रह सकता है. ऐसा ही एक दिन मेरे साथ शायद तब तक सांसे लेता रहेगा जब तक मैं जिंदगी के सफ़र में हूँ. 
पिछले 6 घंटे की बस की यात्रा ने मुझे बहुत थका दिया था. रात सोने की कोशिश में कट गयी थी. सुबह के लगभग 5 बजे थे, बस एक ढाबे पर रुकी, कंडक्टर ने आवाज लगाई, अगर किसी को चाय वाय पीनी हो तो पी लो. हम 20 मिनट बाद चलेंगे. मै नीचे उतर गया. मुझे जानने वाले सब लोग जानते हैं कि चाय मेरे लिए क्या मायने रखती है. 
मैं एक टेबल के सामने जाकर बैठा - सामने से 12- 14 साल का लड़का आँख मलते हुए मेरे पास आ खड़ा हुआ. पहले मैं समझा नहीं. वो लगातार मुझे देखा रहा था. थोड़ी देर में मुझसे बोला - "क्या चाहिए"
मैंने जल्दी से बोला - "एक चाय" 
वो चला गया. वापस आया तो हाथ में चाय का गिलास था. उसकी आँखें अब पूरी खुल चुकी थी. पक्का रंग और बड़ी बड़ी आँखें.  
मैंने चाय ली और उससे उसका नाम पूछा . उसने नाम तो नहीं बताया उलटे मुझे ऐसा देखा जैसे मैं कोई असामाजिक तत्व हूँ. 

वो वापस गया और बाकि यात्रियों से मुखातिब हो गया. मैं उसकी तन्मयता देख रह था. उसे इस बात से कोई मतलब नहीं था कि बस से उतरा आदमी किस स्तर या किस जात का था. सबके लिए एक जैसा. चुस्त और बेपरवाह सा.
मैं बस उसे देख रहा था. चाय ख़तम होते ही मैंने उसे बुलाया.
कहाँ रहते हो? माँ बाप कहाँ है? कितने पैसे मिलते हैं? कितने घंटे काम करते हो? पढाई? मैं उस से बहुत सारे सवाल पूछना चाहता था.
आया भी मैंने सवाल दागे भी - वो बोला - 
साहब आपके पास सवाल बहुत हैं और मेरे पास काम. यहाँ सवालों में उलझा तो काम कौन करेगा? 
वो चला गया. भीतर. शायद बर्तन मलने. मैं  अपने सवालों के साथ वहीँ ठगा सा बैठा रहा.
लोग बस में चढ़ने लगे थे. मैं भी चढ़ा. अपना बैग लिया और उतर आया. क्यों? आज भी यही सोचता हूँ कि मैं उतरा क्यों था?मैं आधे दिन भर ढाबे पर रुका. मालिक से आग्रह फिर अनुमति  के बाद मैंने बर्तन भी धोये, लोगों से ऑर्डर भी लिया (सच कहूं तो लोगों कि उपेक्षित निगाहों का सामना किया), भाजी काटी, झाड़ू भी लगायी. वो लड़का मुझे देखकर मुस्कुराता रहा था. गुनगुनाता भी था जैसे जिंदगी के किसी गीत पर झूमता हो. मैंने उसे नहाते नहीं देखा. शायद मुंह भी नहीं धोया था. एक बार बैठे देखा, हाथ में मैगजीन - वो तस्वीरें देखता रहा था शायद. 
मैंने जाकर पूछा - पढ़ते भी हो? उसने ना में गर्दन हिला दी. 
मैंने पूछा - बिलकुल भी नहीं? - उसने और बड़ी गर्दन हिला दी. 
माँ बाप?- पास के गाँव में रहते हैं. 
घर कब जाते हो? - कभी कभी. 
बाप क्या काम करता है? - दारू पीता है.
काम क्या करता है? - वो चुप रहा. 
कब से यहाँ काम करते हो? -  उसने पाँचों उँगलियाँ दिखाई और बोला - चार साल से. 
कितना पैसा मिलता है - 300 रूपये और रहना - खाना.  (दस रूपये रोज़)
पढने का मन नहीं होता? - होता है. पर मन होने से सब कुछ होता है क्या? (उसने कितनी मासूमियत से कितना बड़ा दर्शन मेरे सामने फेंका था)
उनके भाग्य और होते होंगे, देखो मेरी लकीरों में पढना लिखा है क्या? 
उसने अपने दोनों हाथ मेरे सामने फैला दिए. मैंने हाथों की तरफ देखा, बर्तन मलने की राख कहीं कहीं हथेलियों में भरी थी. मेरी निगाहें झुक गयी, मेरी हिम्मत नहीं थी कि उस से आँखें मिला सकता. मुझे लगा कि  यह देश जिसके लिए ना जाने कितने खून बहा था. इसलिए तो नहीं  ना कि बालकों को उनका लड़कपन भी ना नसीब हो. 
थोड़ी ही देर में मैंने अपना बैग उठा लिया. मैंने सड़क के किनारे खड़े होकर बस का इन्तजार करता रहा...... 
मुझे अब भी किसी भी ढाबे पर उतरने से डर लगता है कि कहीं उन दो आँखों और राख भरी उन हथेलियों से सामना ना हो जाये.
 


8 comments:

  1. Sach me aapki likhavat me shabdo ko picturization karne ka jaadoo hai

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  2. बहुत खूब ..........,
    बेहतरीन रचना
    ढाबा
    ढाबे पर
    बेहतरीन जिंदगी जीने के
    सपने......
    सिर्फ सपने
    लिए सिसकता बचपन
    राख़ भरी.
    बिना लकीरों की
    हधेलियाँ
    और
    उनके लिए दिल मैं दर्द लिए
    एक बंजारा जिसका काम
    है
    अन्छूवे भारत
    से रूबरू कराना
    हमें........ साधूवाद

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  3. bhaiya wat ws dat..... ye sach mein mindblowng tha.... pta ase xperiences b apko hi hote coz mjhe ni lgta k hum mei se koi us din bus se utarta, atleast main to nhi..... pta ap bht provoking likhte ho, sochne pe majboor kr dete ho......

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  4. "maan hone se sab kuch hota hai kya"

    sahi kahan usne....maan to bahot kuch krne ka hota hai...bt zaruri nhi jo krne ka maan ho wo kr paye...

    sumtyms v av put our desires aside for living and our family...

    reely gud1 bhai.....

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  5. Such a live explanation and yes its reality.
    Thanks Rahul at least u brought your true views in front of all of us.

    One more thing your writing is awsm yaar.

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  6. "pta ap bht provoking likhte ho, sochne pe majboor kr dete ho...... "

    Likhtey hi nahi life bhi jitey hain ham me sey koi utar bhi jata to kuch ghantey wo ladkey ki life jo jee kar dekhi neel ney wo nahi jita..aur jab tak life nahi jee tab tak uska dard kya samajh ayega

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  7. सच कहा भैया, उनके सच्चे सवालो के आगे हम कहा खड़े हो पायेगे? कुछ पल मानो, मन कौन सी दुनिया में खो जाता है, अलग सी पड़ी कुछ संवेदनाये, ना जाने कब इनको कर्म रूप में देख पाउगा. सपना है एक ऐसा ही नील भैया, आपको लिखूगा कभी फुर्सत में...

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