Monday, June 6, 2011

वाह रे भारत के गाँव.

कई बार हम जिंदगी के ऐसे दोराहे पर खड़े होते हैं. जाना से वापसी मुश्किल होती है और आगे जाने का विकल्प खत्म हो चुका होता है. यह बात तब तक अनुभव पर नही उतरी थी. हमने सुबह सूरज निकलने से पहले ही चढ़ाई शुरू कर दी थी. शुरुआत अच्छी नहीं थी क्योंकि उस गाँव से बहार निकलते ही नदी पार करते समय हमारे  दो साथी नदी में गिर गए थे. हम उनकी हालत समझ सकते थे क्योंकि सामने बर्फीले पहाड़ हमें दिख रहे थे. जहाँ से नदी बह कर बस जरा सा नीचे आई थी. वापस जाना नहीं था इस लिए बस चल पड़े.





सामने के पहाड़ पर बसे उस गाँव को हमने पार किया तो पता चला कि इस दिशा में यह आखिरी गाँव था. हमें तत्वानी जाना था. (यह क्षेत्रीय भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है तपता हुआ पानी) हमें बस दिशा पता थी और इतना पता था कि लोग जाते हैं तो एक दिन में वापसी नहीं होती. सब जोश से भरे थे. सोचा जो होगा देखा जायेगा. रास्ते में कोई कोई लकड़ी काटने वाला मिलता तो यही कहता कि अभी तो दूर है. 
सुनते - सुनते, चलते - चलते सब थकने लगे थे. रास्ता मुश्किल था क्योंकि वह कुछ दिन पहले हुई बर्फवारी ने उसे फिसलन भरा बना दिया था.
सूरज सिर पर चढ़ा और फिर उतरने लगा. आस पास कोई नहीं था जिस से कुछ पूछ सकते. रुक गए. जो साथ था खाया. कुछ लोगों ने आगे जाकर भी देखा लेकिन गरम पानी के झरने या स्रोत जैसा कुछ नहीं दिखा. कोई चिन्ह तक नहीं. 
सबने तय किया कि वापस चला जाए लेकिन उस रास्ते से नहीं जिस से हम आये थे क्योंकि रास्ता खतरनाक था, फिसलन भरा. किसी ने कहा कि नीचे जो नदी बह रही है हम इसके साथ साथ ही आये हैं क्यों न नदी में उतर जाएँ और उसके साथ साथ चलें. पहाड़ी नदी कि आदत और सीरत से कोई वाकिफ नहीं था. बस उतर गए. पानी पर जमी बर्फ पर पांव पड़ते ही पांव पानी में. या इतने बड़े पत्थर या चट्टानें कि आगे रास्ता न मिले. फिर भी एक दूसरे को सहारा देते सब बढ़ रहे थे. कोई घंटा भरा चले थे कि हमें रुकना पड़ा क्योंकि आगे नदी एक झरने की तरह लगभग 200 फिट नीचे गिर रही थी. सारा मुआयना करने के बाद कोई रास्ता नहीं मिला.
 
वापस जा नही सकते. नीचे कूद नहीं सकते. शाम ढलने लगी है. ये बात सबको पता थी कि यह इलाका जंगली भालूओं के लिए भी जाना जाता है. हिमाचल कि अपर कांगड़ा घाटी. 
साथ वाले पहाड़ पर चढ़ना शुरू किया. एक दम नंगा खड़ा पहाड़. कई बार पकड़ने को छोटी घास भी नहीं. कई बार पैरों का कोई ठिकाना नहीं. यही वो दिन था जिस दिन से मैंने और शायद मेरे कई और साथियों ने मौत से डरना छोड़ दिया.
करीब 3 घंटे लगे. हम वापस उसी पहाड़ कि चोटी पर पहुचे जहाँ से चार घंटे पहले हम नदी में उतरे थे. सूरज डूब चुका था बिना इस बात की फिक्र किये कि हमारा क्या होगा. वो अस्त हो गया. दुनिया वालों की तरह जरूरत के वक़्त वो भी साथ नहीं था. हमारा एक साथी हमसे अलग हो गया ये ऊपर पहुँच कर पता चला. और एक बात भी की वो बैग जिसमे टोर्च, रस्सी, चाकू सब कुछ था वह भी नीचे छूट गया था जहाँ से हमने पहाड़ की चढ़ाई शुरू की थी. मुसीबत अकेले कहाँ आती है. बड़ा कोई साथ नहीं. आप पर 15 साथियों की जिम्मेदारी, रास्ते का कोई अंत  पता नही. खैर! जिस रास्ते से डरकर हमने रास्ता बदला था हम वापस उसी रास्ते पर खड़े थे. कैसे न मानूं की ईश्वर नहीं है. अगर वो नहीं है तो वैसा क्यों नहीं होता जैसा "मैं" चाहता हूँ.
हम इस समय एक ऐसे दोराहे पर खड़े थे जिसका कोई भी रास्ता आसन नहीं था. एक बार मन में आया की यहाँ कोई खोह या गुफा ढूंढते हैं, पर हड्डियाँ गलने वाली उस ठण्ड का क्या? वहां रुकना किसी भी तरह की बहादुरी नहीं थी. कहते हैं बहादुरी और बेवकूफी में बस जरा सा अंतर होता है. हम चल पड़े. साथ साथ. फिसलते भी थे. गिरते भी थे. 
क्यों डरें ज़िन्दगी में कि क्या होगा
जो कुछ न होगा तो तजुर्बा होगा....
शरीर का पोर पोर दर्द के मारे चीख रहा था. पिछले चार घंटे से पानी भी नहीं मिला था. बस चलना और चलना. मैंने रात को इतनी काली और डरावनी कभी नहीं देखा था. यहाँ तक कि उस काली रात में चमकने वाले तारे कुछ चुभ से रहे थे. पीछे के कदम को इतना भी इल्म नही था कि आगे वाला कदम कहाँ पड़ेगा. क्योंकि डेढ़ फिट की पगडण्डी और उसके नीचे हजारों फिट गहरी खाइयाँ सुरसा की तरह मुंह फैलाये खड़ी थी. 
रात आधी बीत चुकी थी जब ये एहसास हुआ कि हम उस गाँव के आसपास हैं. रात के एक बजने वाले थे हम गाँव में पहुंचे. हम गाँव की बाहर वाली पगडण्डी पर पहुंचे ही थे कि कुछ आवाजें सुनाई दी. सामने गाँव के कुछ लोग बैठे थे.  हिम्मत जुटाकर गाँव के उस पहले घर कि ड्योढ़ी  पर हम  पहुंचे. पता चला कि "गाँव के लोग ये कुछ अभी तक सोये नहीं थे उन्हें पता था कि हम लोग तत्वानी की तरफ निकले हैं. उन्होंने बताया की अगर हम लोग थोड़ी देर में गाँव तक ना आते तो गाँव के लोग हमें ढूँढने निकलने वाले थे." आश्चर्य हुआ सुनकर. शोर और आवाजें सुनकर धीरे धीरे पूरा गाँव जाग गया. कुछ तरुण भी वहां इकठ्ठा हो गए. 
हमने पानी पिया. कुछ देर वहां रुके हम सोच भी नहीं सकते थे की अनजाने गाँव के लोग रात को हमरी फ़िक्र में जागे होंगे.. ये कौन सा रिश्ता है? मन कहा कहाँ नहीं  उड़ा? गर्व, संतुष्टि, स्नेह और जाने क्या क्या विशेषण. उन बुजुर्गों कि तसल्ली ने मन हल्का कर दिया. गाँव वाले यहाँ तक तैयार थे कि हम सब उस गाँव में रुकें. वो सब व्यवस्था कर देंगे. सब गाँव वाले बोले कि एक एक - दो दो लोग कुछ घरों में जाएँ. खाना खाकर आराम करो. हम रुक नहीं सकते थे क्योंकि  जिस हमारा एक साथी जो अलग हुआ था उसका अभी तक कुछ पता नही था. सबसे आगे चलने के कारण सबका मत यही था कि वो बेस कैंप  पहुँच गया होगा. 
हमने अभी जाने कि जिद की तो गाँव के बुजुर्गों के कहने पर 5 तरुण तुरंत तैयार हुए. बैम्बू की मशालें हाथ में ली. और हमारे साथ हो लिए. इस पहाड़ के नीचे नदी पार करके हमारा बेस कैंप था. रात के 2 .30 बज रहे थे जब हम अपनी मंजिल पर पहुंचे. हम सब सकुशल पहुँच गए. गाँव के इन तरुणों के लिए धन्यवाद जैसे शब्द बहुत छोटे थे. हमें छोड़कर वे वापस चले गए. मुझे याद आया कि मेरे शहर में किसी से किसी के घर का पता भी पूछो तो लोग मुंह फिर कर निकल लेते हैं. वाह रे भारत के गाँव. वाह री गाँव की माटी.

9 comments:

  1. awesome bhaiya.....sahi ki kaha hain ki bharat ka dil gao main basta hain....

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  2. kha sahi hai par na jane kyo wo hi gao k log sahro mian aakar sab bulne lagte hai,nhi to wo hi gao ka bharat city main bhi basne lag jaye

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  3. Bharat mein gao ki atma abhi bhi pavitra hain.. Sharafat aur pyar dekhna hain to aisey hi kisi gao mein jao bahut aram sey uplabdh hain..

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  4. Ultimate experience....BUt wo "Tatvani" reh gayee dekhne se...don't you regret for that...I am a bit sanki in that..mai fir jata whan...loll

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  5. bhaiyya...kya vo sahi me base camp pahuch chuka tha....??
    Tatwani...i knw !!

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  6. jai gram devta aise hi tode hi kha gya hai in bato se sidh to yahi hota hai ki bharat ke gaaon dev nivash bhi hai

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  7. ये अनुभव किसी अनुभवी को ही मिलते है नील जी. वो प्यार, अपनापन और विश्वास ही तो है जो हमें बाकी सब संसार से अलग पहचान दिलाता है. हमें अपनों से दूर बैठे होने पर भी "अपना" बनाये रखने की शक्ति देता है. काश! मैं भी आपके साथ होता तो मज़ा आता ट्रेकिंग में..:)

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  8. yaar.....mazza aa gaya...but aapne ye nhi bataya ki fir nxt day kaun gaya aapka purse lene....???? all dese experiences define wht neel exactly is.................

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  9. hahhah........sabse pehla yahi expression tha padhte he,,,,,kaun nai janta is baare main.TATVANI TREKKING..:)ultimate experience bhaiya g.....kuch bevkoof bahaduron ka bahadur trekking experience.......haahhah no offence haan

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