कई बार राह चलते कोई मिलता है, आपके साथ बिताये कुछ लम्हात जिंदगी भर के लिए एक धरोहर बन जाते हैं. किसी का कहा एक वाक्य जिंदगी भर आपके साथ चलता है. मेरे दादा जी अक्सर एक बात कहा करता थे की सफ़र में अगर मौका मिले तो किसी बुजुर्ग के साथ बैठना. वो जाते जाते कोई न कोई काम की बात बताकर ही जायेगा. इलाहाबाद में उस समय के जिम्नास्टिक के नेशनल चैम्पियन विकास ने मुझे स्टेशन पर छोड़ा. हम लोग थोडा सा पहले ही पहुँच गए थे. मैंने विकास को विदा क्या और अपनी बर्थ पर आ बैठा. साइड की लोअर सीट मुझे हमेशा ही अच्छी लगती है. क्योंकि दो खिडकियों और उनसे आने वाली उन्मुक्त हवा पर केवल आपका अधिकार होता है.
मैं खिड़की से बहार के उस संसार में व्यस्त हो गया. मुझे हमेशा ही स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर एक अलग दुनिया नज़र आती है. किसी से कोई मतलब नहीं. छोड़ने वाला छोड़कर चला जाता है. लोग ज्यादा से ज्यादा तब तक हाथ हिलाएंगे जब तक ट्रेन स्टेशन न छोड़े. फिर सब अपनी में व्यस्त. वह कोई किसी को नहीं जनता कि कौन किस के लिया क्या मायने रखता है.

मैंने अपने पैरों को समेट लिया. वे बिना कुछ बोले बैठ गयीं उनसे केवल नाम मात्र का परिचय हुआ और मैं वापस खिड़की से बाहर की उस दुनिया में खो गया. बाहर के उस शोर में भी एक अलग ही आनंद है. मैंने देखा कि वो सब कुछ प्लेटफ़ॉर्म पर मिलता है जिस से रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी चलती है.
खिड़की के बाहर ठेले वालों का अपना समाज है. अपनी धाक है.
एक ठेले वाला बुल्कुल मेरी खिड़की के पास आकर खड़ा हो गया. आइसक्रीम वाला. मैंने एक बार ठेले वाले को देखा और दुसरे से पल अपनी उस सहयात्री को. उन्होंने पहले मुझे देखा और फिर उस ठेले वाले को. "बेटा आइसक्रीम खाओगे?" उन्होंने पूछा. मैंने तुरंत इंकार में गर्दन हिला दी. और वापस खिड़की के बाहर. ठेले वाला कुछ देर खड़ा रहा और फिर आवाज लगता हुआ आगे निकल गया. मैंने कनखियों से देखा तो वो भी खिड़की से बाहर जाते हुए उस ठेले वाले को देख रही थी.
अचानक जैसे मैं नींद से जगा. उनका चेहरा देखकर मुझे यही लगा कि उनका आइसक्रीम खाने का बहुत मन था और मेरी वजह से उन्होंने भी मन मार लिया.
मैं खिड़की से बहार के उस संसार में व्यस्त हो गया. मुझे हमेशा ही स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर एक अलग दुनिया नज़र आती है. किसी से कोई मतलब नहीं. छोड़ने वाला छोड़कर चला जाता है. लोग ज्यादा से ज्यादा तब तक हाथ हिलाएंगे जब तक ट्रेन स्टेशन न छोड़े. फिर सब अपनी में व्यस्त. वह कोई किसी को नहीं जनता कि कौन किस के लिया क्या मायने रखता है.

एक रंग बिरंगा संसार आँखों के सामने दौड़ता रहता है. जिसके पास सब कुछ है बस समय नहीं है. व्यस्तता कि सही परिभाषा और समय की कमी को सही रूप में जानना हो तो किसी प्लेटफ़ॉर्म पर जाकर बैठिये.
मैं खिड़की में बैठा बैठा उस दुनिया में खुद को ढूंढ रहा था कि एक बड़ी ही विनम्र आवाज से मेरी तन्द्रा टूटी. "बेटा! मुझे फतेहपुर तक जाना है क्या मैं यहाँ बैठ जाऊ? " मैंने एक बार उनकी और देखा. लगभग 50 को छू रही एक अधेड़ लेकिन सभ्रांत सी दिखने वाली एक महिला मेरे बिलकुल पैरों के पास खड़ी थी. हलकी धानी साड़ी, गले में पतली सी माला, शायद रूबी. एक पल नज़रें ठहरीं. व्यक्तिव था ही ऐसा और उनकी आवाज में विनम्रता के साथ एक खनक भी थी. मैंने अपने पैरों को समेट लिया. मैंने अपने पैरों को समेट लिया. वे बिना कुछ बोले बैठ गयीं उनसे केवल नाम मात्र का परिचय हुआ और मैं वापस खिड़की से बाहर की उस दुनिया में खो गया. बाहर के उस शोर में भी एक अलग ही आनंद है. मैंने देखा कि वो सब कुछ प्लेटफ़ॉर्म पर मिलता है जिस से रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी चलती है.
खिड़की के बाहर ठेले वालों का अपना समाज है. अपनी धाक है.
एक ठेले वाला बुल्कुल मेरी खिड़की के पास आकर खड़ा हो गया. आइसक्रीम वाला. मैंने एक बार ठेले वाले को देखा और दुसरे से पल अपनी उस सहयात्री को. उन्होंने पहले मुझे देखा और फिर उस ठेले वाले को. "बेटा आइसक्रीम खाओगे?" उन्होंने पूछा. मैंने तुरंत इंकार में गर्दन हिला दी. और वापस खिड़की के बाहर. ठेले वाला कुछ देर खड़ा रहा और फिर आवाज लगता हुआ आगे निकल गया. मैंने कनखियों से देखा तो वो भी खिड़की से बाहर जाते हुए उस ठेले वाले को देख रही थी.
अचानक जैसे मैं नींद से जगा. उनका चेहरा देखकर मुझे यही लगा कि उनका आइसक्रीम खाने का बहुत मन था और मेरी वजह से उन्होंने भी मन मार लिया.
मैं डिब्बे से बहार निकला और दौड़ पड़ा. ठेले वाले की तरफ. ट्रेन का हूटर बज रहा था. मैंने बिना इस बात की परवाह किये कि उन्हें क्या पसंद होगा. मैंने दो आइसक्रीम खरीदी. भागते भागते किसी तरह ट्रेन में चढ़ा. जाकर उन्हें एक आइसक्रीम दी. लेने से पहले उन्होंने मुझे एक पल के लिए देखा, आइसक्रीम ली और फिर चुपचाप हम दोनों आइसक्रीम खाते रहे. ट्रेन ने तब तक अच्छी रफ़्तार पकड़ ली थी. मैं अभी भी खिड़की से बहार देख रहा था इस संतुष्टि के साथ कि शायद मैंने जो किया सही किया.
उसके बाद उन्होंने अपने पर्स से 50 का एक नोट निकाला और मुझे देने लगीं. मैंने मन कर दिया तो जबरदस्ती मेरे हाथ में पकड़ने लगीं तो मैनेकः कि ये ठीक नहीं है. अचनक मेरे गाल पर हल्का सचापट लगते हुए बोली - "बेटा हम सबका अपना अपना दायित्व होता है, अपनी अपनी भूमिका - कुछ काम अगर बड़े लोग करें तो ही अच्चे लगते हैं." यह वाक्य आज तक मुझे मेरे छोटों के साथ मेरे दायित्वों और भूमिकाओं के लिए मार्गदर्शन करता है.
यह वाक्य मुझे निरुत्तर कर गया और मैंने चुपचाप वो 50 रूपये ले लिए. मुझे लगा कि इस वक़्त यही मेरी सबसे बेहतरीन भूमिका थी. उसके बाद उनसे खूब बात हुई. डॉ. आभा मान सिंह, फतेहपुर डिग्री कॉलेज कि हिंदी कि प्रोफेसर. उन दो घंटों में जो सम्बन्ध बना वो आज भी साथ है.
फिर ऐसा कभी भी नहीं हुआ कि मैंने कोई पत्र लिखा हो और उन्होंने उनका जवाब न आया हो. मुझे और अच्छ अलग जब पिछले साल उनके बेटे के विवाह का निमंत्रण पत्र मुझे मिला..
उस दिन मुझे लगा था कि कब, कौन, कहाँ - किस तरह आपको जीवन का कोई अमूल्य मंत्र दे जाये, क्या पता.
कहते है न कि, चुम्बक लोहे को खीच ही लेता है. वैसे ही आपके सदगुण आपको हमेशा सज्जन इंसानों से मिलाते है. आपके साथ बंगलोरे कैंप और मंसूरी कैंप के दौरान रेल में सफ़र किया है. उन लम्हों को लिख कर कह पाना मुश्किल है. "बेटा हम सबका अपना अपना दायित्व होता है, अपनी अपनी भूमिका - कुछ काम अगर बड़े लोग करें तो ही अच्हे लगते हैं" सही कहा नील जी....मज़ा आया और हमने भी कुछ सीख लिया........
ReplyDeleteTu icecream dekhe aur na khaye??? aisa ho sakta hai kya??
ReplyDeleteDaant aise hi sade nahi hain tere...
Nice..
ReplyDeleteVery nice.. bhaiya... aap poems ab stories.. me bhi sahi jaa rahe. hho..
ReplyDeleteNice..
ReplyDeleteTrain journey ki yaad aagayi..
AApke blog mai har baar kuch n kuch seekhne ko milta hai.
ReplyDeleteElders teaching gives us a vision to see thing differently from the way we see them...
ReplyDeleteहम सबका अपना अपना दायित्व होता है, अपनी अपनी भूमिका
I believe..
ki Unhone aapko yeh khe kar aapne elder hone ki भूमिका nibhaye..
Aur aap hum sabh ke saath use share karke aapna दायित्व purn kar rahe ho..
Nice....Hmne b sikh liya....
ReplyDeleteबेटा हम सबका अपना अपना दायित्व होता है, अपनी अपनी भूमिका - कुछ काम अगर बड़े लोग करें तो ही अच्चे लगते हैं...
ReplyDeletebahut hi kadak.... sach baat hai....
बेटा हम सबका अपना अपना दायित्व होता है, अपनी अपनी भूमिका - कुछ काम अगर बड़े लोग करें तो ही अच्चे लगते हैं...
ReplyDeleteक्या बात है
चलो अभी ५००००० दे दो
आजकल कंगाली चल रही है
वैसे भी उधार नही मांग रहा हूं
कुछ काम बड़े ही करें तो अच्छा लगता है
सबके अपने अपने दायित्व
खैर
मजा आया पढ़कर
वैसे ये बताओ की ममता दीदी से कोई
सम्बन्ध है परिवार मैं कोई रेलवे मैं है
हर सफ़र मैं एक कहानी वो भी अच्छी वाली
लोगों के तो सामान गायब होते सुने हैं मैंने
@ kuldeep ji chhoto ke bhi kuch dayitva hote hain..
ReplyDelete@ Chaudhari saab,
ReplyDeleteBuss shuru kar di diplomacy.......!