Monday, June 13, 2011

यह सब ईद से कम भी नहीं.

मोईन संस्कृत में  MA कर रहा है. और आगे जाकर रिसर्च करना चाहता है. नईम मूर्तियाँ बनाना सीखता है और आगे जाकर एंटीक चीजों का व्यापार करना चाहता है. मैं सामने फैली पड़ी उस झील पर निगाह डालता हूँ. तभी एक परिंदा सामने से आसमान में ऊँचा उड़ता दिखता है कोशिश करता हूँ  तुलना कर सकूं - इस समय इनके सपनों की उडान ऊँची है या इस परिंदे की. 


इस समय उन दोनों की आँखे और गहरी दिखाई दीं.
मैं फतेहपुर से फतेह सागर की तरफ पैदल ही चल पड़ा था. हाथ में कैमरा और कन्धों पर बैग. सूरज ने अभी अभी पगडण्डी से उतरना शुरू ही किया था. गर्मी अभी भी वैसी ही थी - तेज. मैंने जान बूझकर पैदल रास्ता पकड़ा था. एक्का दुक्का लोग आ जा रहे थे, वातावरण में एक अजीब सा आलसपन छाया था. पीछे से किसी मोटर साईकिल का होर्न, मैं किनारे हुआ. अचानक एक तेज ब्रेक की आवाज. एक बैठा लड़का पीछे मुड़ा और बोला - "लिफ्ट?" कहाँ तक जाओगे? 
मैंने कहा फ़तेह सागर तक. 
मैं बैठ गया. कुछ ही मिनटों में हम फ़तेह सागर पर थे. सूरज और नीचे उतरने लगा था. उन दोनों से बात होती रही. उनके नाम, पढाई, काम, घर - बार और बहुत कुछ, वे बताये जा रहे थे और मैं सुनता जा रहा था. उतने ही मन से जितने मन से मैं सूरज को नीचे झील में झांकते  रहा था. फिर मैं अपनी सुनाता रहा और वे सुनते रहे शायद उतने ही मन से. 
"और इस तरह हर जुम्मे की पाक नमाज़ के बाद हम निकल पड़ते हैं के कोई अजनबी शहर में आया हो तो उसे शहर से रूबरू करवा सकें" नईम के इस आखिरी वाक्य ने मुझे भीतर तक हिला दिया था.
मैंने घडी में देखा तो 5 बज रहे थे. आठ बजे मेरी ट्रेन थी. उज्जैन के लिए. तीन घंटे मेरे पास थे. उदय सागर, पिछौला झील, बड़ी झील, सहेलियों का बाड़ा और बहतु कुछ उन दोनों के साथ देखा. 

आज मैंने उदयपुर को उन दोनों के पीछे बैठकर एक नए रंग में देखा था. शहर जाने कितने कितने रंगों में रंगा था. शाम कुछ ज्यादा ही सिन्दूरी थी और आसमान कुछ ज्यादा ही खिला था.  सूरज को मैंने गिरते देखा था बड़ी झील में. मैं साँझ भर उड़ता रहा था. बड़ी झील से वापसी के समय. मोईन उतर गया. 
मैंने नईम के साथ उदयपुर का बाजार देखा. कुछ खरीदारी भी की. 
8 बजने वाले थे. नईम ने मुझे स्टेशन छोड़ा. प्लेटफ़ॉर्म तक मेरे साथ आया. मुझे बैग भी नहीं उठाने दिया. बीच में मैंने एक दो बार पूछा के मोईन कहाँ है तो नईम ने कहा के बस आता ही होगा. गाड़ी का हूटर बजने लगा था. मैं दरवाजे पर खड़ा सोच रह था की जिन्हें में दोपहर तक जानता तक न था उन्होंने मुझे एक शानदार दिन उपहार में दिया था. इन्हें अजनबियों को शहर दिखाकर क्या मिलता होगा. 
मेरी आँखें अभी तक मोईन को खोज रही थी जो अचानक कहीं गायब हो गया था. मैं प्लेटफोर्म पर खड़ा था पर चाहता था की मोईन भी होता तो अच्छा होता. गाड़ी ने दोबारा हूटर दिया . नईम ने आगे बढ़कर मुझे गले लगाया. मैं एक शब्द भी नहीं बोल पाया. कोई शब्द था ही नहीं मेरे पास. मैएँ अपने आप को इतना रिक्त कभी भी नहीं पाया था.गाड़ी ने सरकना शुरू किया. देखा तो तभी मोईन दौड़ता हुआ आ रहा था. मेरे पास पहुँचता तब तक में दरवाजे पर चढ़ चुका था. प्लेटफोर्म खत्म होने तक वो दौड़ता रहा था. आखिरी लम्हे में उसने मेरे हाथ में कागज का एक थैला पकड़ा दिया और जोर से बोला "घर से लाया हूँ". 
मैं बहुत देर तक उन दोनों के हिलते हुए हाथ देख रहा था. जब तक देख सकता था. थोड़ी देर में स्टेशन, प्लेटफोर्म, रोशनियाँ सब कुछ अँधेरे में घुल चुके थे. मैं अपनी सीट पर पहुंचा.
थोड़ी देर तक आँखें बंद करके सिर टिकाये बैठा रहा था. पूरा दिन मेरी आँखों के सामने खेल रहा था. थोड़ी देर बाद मैंने धीरे से कागज का वो थैला खोला. प्लास्टिक के दो डिब्बे. पहला खोला तो उसमे तीन खमीरी रोटियां थी. और दूसरे डिब्बे को खोलकर मैंने कुछ देर जड़ हो गया था. तटस्थ. उस डिब्बे में सिवैय्याँ भरी थी. मेरे मूंह से निकला - आहा! डिब्बा खुलते ही एक मीठी सी महक पूरे डिब्बे में घुल गयी.    
अचानक याद आया. अरे! शाम को झील के किनारे बातों बातों में मैंने कहा था - "मैंने कभी ईद पर बनने वालीं सिवैय्याँ नहीं खायीं." अरे......
कितनी ही देर तक मेरे सामने तीनों खमीरी रोटियां और सिवैय्याँ ऐसे ही रखी रही. मैं समझ नहीं पा रहा था की आज ईद तो नहीं थी. पर  उसी पल लगा की यह सब  ईद से कम भी नहीं.
   

12 comments:

  1. saanjh bhar udta raha..wah! bhaiya..yeh sab waise aapk sapno ki udaan main ghatti baatein he to hain jo hum sab padh rahe hae....aur jab is dauran aap kuch aise he acche logon se mile to mila ek khoobsurat din eed ki saugat aur pyaar k saath...padhte waqt kuch baatein yaad aaye bhaiya....aapka bataya hua udaipur ka sundar shehar saath main aapki kheenche hue behad khoobsurat photos..aur khameere roti aur sewaiyaan padh l halki si hansi..."bahut lamba hae safar bas kuch der saath chalo"..aur bhaiya aapka he kehna hae logon ko rishton se jyada pyaar jodta hae..to shayad wahi tha

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  2. Gr8.... Na jane ase kitne naeem, moeen aur "neel" ki zrurat hai apne desh ko b..... Another gr8 piece of work bhaiya..... nd very touchng too.....

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  3. grt wow,us pyare sahar ki pyari baate tazaaa kara de,fatah sagar k paas pahadi par nimachmataji ka mandir hai wha gye the kya,agar jao to raat main jana wha se udaipur ka jo njara dikta hai wo adbhut hai or wha raat ko sahar ki rosni main lake unindi se lagti hai wo khamosh jhile baat hi kuch or hai

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  4. WoW, such a beautiful evening.
    What a beautiful narration of that evening. By reading this everything alive in front of me.
    Awsm n mind blowing writing techniques.
    Keep it up.

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  5. इस समय इनके सपनों की उडान ऊँची है या इस परिंदे की.
    really a nyc line bhaia.....
    m also wanna say smthng abt dis relation...
    लोग बदल रहे हैं,
    रिश्ते बदल रहे हैं,
    पर हर किसी इन्सान में आज भी
    एक हिन्दुस्तानी दिल धड़कता है......

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  6. a gr8 experience.... ek issa wakya jo shayad hamesha yaad rahega..

    Ache log aaj bhi jo bagar kisi swarth ke kaam karte hai....

    Wakai ye kisi eid se kam nahi tha..

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  7. Again I am with no words...my words has been finished to praise..but not your beautiful experiences...I want you share so much kee mai jo likh raha hoon abhi bhi wo bhi na likh paoun..sirf ek expression dene ke liye bache mere pass...

    Shayad aapko bada kareeb se dekha hai jitna bhi saath raha hoon....I can picture it what you would have been feeling and reacting when Sivayee n roti was in your hand...your face come into ma eyes and something unknown touched me deep inside my heart..i donno what it is....this is the magic of your writing and words that the reader feels it all happening wround and a visualization which is virtual front the eyes through our mind...sahi mein bhai awesome...."Parndo kee udaan......" ultimate

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  8. आपके लेखन की प्रशंसा करने के लिए मेरे शब्दकोष में शब्द नहीं है. बस आप यू ही लिखते रहिये, हम इन्ही शब्दों से आपको समझने की कोशिश करते रहेगे. उन दोनों की निश्चलता और प्यार को महसूस किया. आप भी तो कम नहीं है. जिस विश्वास से आप खुद को समर्पित कर देते है,शायद यही सामने वाले को होसला देता है और आपकी तरह वो भी आप में खो कर चल पड़ता है कुदरत के संग.... खूब लिखिए और हमें उन्मुक्त करते रहिये

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  9. अचानक याद आया. अरे! शाम को झील के किनारे बातों बातों में मैंने कहा था - "मैंने कभी ईद पर बनने वालीं सिवैय्याँ नहीं खायीं." अरे......
    कितनी ही देर तक मेरे सामने तीनों खमीरी रोटियां और सिवैय्याँ ऐसे ही रखी रही. मैं समझ नहीं पा रहा था की आज ईद तो नहीं थी. पर उसी पल लगा की यह सब ईद से कम भी नहीं.

    Ohhh bhai kitna Emotional atyachaar karte ho aap seedhe saadhe logon par.....
    ab mujhe hi dekh lo
    jo kabhi aapki kahaani ka patraa nhi hai
    apni padhayi chhodkar cmnt karne aana pada
    jante ho kyun
    kya bola tha aapne

    NAMSTE :) :) :)

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  10. wow..gr8 bhaiya...
    amazing writing...n i hv no words to express my emotions..it's just wonderful...

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  11. while i read your experiences.....it really envokes me to just stand up get a train and visit somewhere unknown, unheard.....

    U are really lucky to experience these beautiful moments....and i thank you to share these moments with us...... :)

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