कई बार आपके अपने तथ्य आपके अपने ही सामने खड़े होकर आप पर हँसते हैं, कई बात आपका अपना ज्ञान और आपकी अपनी परीधियाँ सिमट कर इतनी छोटी हो जाती हैं कि आप उसमे अपना अस्तित्व ढूढ़ रहे होते हैं.
उस रात मैं गंगा के किनारे उस भीड़ में खड़ा अपने उस अस्तित्व को ढूंढ रहा था, जो लाखों लोगो कि उस असीम श्रद्धा के बीच कहीं गुम था.
मन गंगा कि उस चमकती बालू के बीच कहीं बिखरा सा पड़ा था. कण - कण छितरा हुआ सा. वो रात बहुत ठंडी थी. कुम्भ के बारे में अब तक जितना सुना था उसे अनुभव करने की जिज्ञासा उस सुनने से कहीं ज्यादा बड़ी थी. हमेशा की तरह अकेला था.
वहां भीड़ बहुत होती है यह सुना था अपार जन समूह होता है. पर वहां पहुचकर लगा कि यह भीड़ कहाँ है? बल्कि यहाँ तो गंगा की पवित्रता के समानांतर श्रद्धा कि एक अनोखी दुनिया बह रही है.
मैं भी बहता रहा उस किनारे पर बैठकर. कडकडाती ठण्ड में लोग गंगा के उस जमा देने वाले पानी में खड़े हैं. नहा रहे हैं. तन पर कोई कपडा नहीं. कौन किस जात का है क्या पता? कौन कितना अमीर, कितना गरीब - गंगा कहाँ जानती है? पाप पुण्य यहाँ एक ही धार में बहते दिख रहे थे. मैं गंगा एक उस किनारे पर बैठा सोच रहा था कि यह कौन सी दुनिया है. बाहर की दुनिया से कितनी अलग.
यह सब सोचते हुए मैंने देख रहा था एक सन्यासी (उम्र 35 से भी कम होगी) मैं पीछे पीछे चल पड़ा. उसने मुझे देखा भी नहीं था की मैं उनके ठीक पीछे था. भीड़ में से निकलते बचते मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी दूसरे लोक में हूँ. भौतिकता से दूर संवेदनाओ की दुनिया. मैं पीछे पीछे चलता रहा. मानों कोई सम्मोहन में खिंचता है. मैं बात करना चाहता था की ऐसा क्या होता है लोगों के जीवन में - जो जीवन की दिशा मोड़ देता है. जीवन का ध्येय बदल देता है और तथागत बुद्ध की तरह जगा देता है एक नया दर्शन.
थोड़ी ही देर में हम दोनों गंगा के किनारे से थोडा दूर बने एक अस्थाई आश्रम में में थे. आश्रम बड़ा था. अनेक तम्बू लगे थे और बिलकुल बीच में लहराता हुआ सफ़ेद ध्वज.
मुझे आश्रम में घुसते देख सन्यासी वही रुक गए. वापस मुड़े. उनकी आँखों में उमड़े प्रश्नचिन्हों को देखकर मैं कुछ कहता उन्होंने कहा - आओ. मैंने आगे बढ़कर पाँव छुए. मेरे सिर पर हल्का सा स्पर्श. एक शांत सा अनुभव. सामने बने एक खुले तम्बू में हम जा बैठे. सुबह के 4 बजने वाले थे.
बाहर की उस दिव्यता और पवित्रता के प्रभाव यहं भी साफ साफ अनुभव किया जा सकता था. मैं अभी तक उस वातावरण के प्रभाव में था. हल्का फुल्का परिचय और फिर उन्होंने जो भी कहा - मेरे सारे प्रश्न मानो गंगा की धरा में बह गए.
IIT का विद्यार्थी - जिसने नुक्लिएर विज्ञान में मास्टर्स किया. फेलोशिप ली और फिर सन्यासी बन गया.
क्यों?
एक निश्छल मुस्कराहट, और सपाट सा जवाब. क्या हर कारण का उत्तर होना आवश्यक है?
क्या यह निर्णय लेने से पहले आपने स्वयं को इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया था? मैंने पूछा .
एक और मुस्कराहट - नहीं!! इस प्रश्न के उत्तर के लिए ही तो निकला था.
फिर भी इस तरह केवल सन्यासी बनना कौन सा समाधान है? - मैंने पूछा.
समाधान नहीं चाहिए था - संतुष्टि चाहिए थी.
उठ खड़े हुए. मेरा हाथ पकड़ा. आओ .
मैं साथ साथ चल पड़ा.
जिस तम्बू में हम अब तक बैठे थे उसके पीछे एक बड़ा सा तम्बू था. उन्होंने उसके दरवाजे का कपडा हटा दिया, हम भीतर गए. लगभग ५० पलंग लगे थे. भीतर हलकी सी रौशनी. पहले ही पलंग पर एक बुजुर्ग थे, सन्यासी को भीतर देख उठ बैठे, सन्यासी उनके पास गए. मैं साथ था. पास जाकर देखा तो उस बुजुर्ग के हाथो - पैरों पर पट्टियाँ बंधी थी. खून से भरे कई घाव खुले थे. मैं कांप उठा. हालत सच में बुरी थी.
एक के बाद एक तीन लोगों को देखा. मैं झटके से घूमा और तम्बू से बाहर.
वो मेरे पीछे पीछे वापस आ गए. पूछा क्या हुआ?
मैं कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं था.
बोले - ये वे लोग हैं जिन्हें इस बीमारी (कोढ़) के कारण उनके घरवालों और बच्चों ने बाहर निकल दिया था. मुझे लगा कि इस तरह के लोगों को मेरी बहुत जरूरत है. "अब यही मेरी दुनिया है और यही मेरा कर्म" तुम ही कहो कि यह समाधान का विषय है या संतुष्टि का?
क्या मेरा विज्ञान मुझे यह संतुष्टि दे सकता था.



Brilliant experience. And much more than experience the lesson which i understood.
ReplyDeletethanks Rahul
i bet, u have an xtra ordinary spectcals to see world from unique angels.
ReplyDeleteand the best part is, u describe ur xperiance in brilliant wordings, phrases and comparisions...
1. गंगा की पवित्रता के समानांतर
ReplyDeleteश्रद्धा कि एक अनोखी दुनिया बह रही है.
2. क्या हर कारण का उत्तर होना आवश्यक है?
3. समाधान नहीं चाहिए था - संतुष्टि चाहिए थी.
प्रशन पूछते हैं आपके अनुभव
या प्रश्न खड़े करते हैं ?
समाज के सामने
पता नही....
लेकिन
हमें सिखाते हैं दुनियादारी
एक अलग आयने से
एक अलग अंदाज मैं
लिखते रहिये .....
बढ़ते रहिये ...!
कौन किस जात का है क्या पता? कौन कितना अमीर, कितना गरीब - गंगा कहाँ जानती है? पाप पुण्य यहाँ एक ही धार में बहते दिख रहे थे. मैं गंगा एक उस किनारे पर बैठा सोच रहा था कि यह कौन सी दुनिया है. बाहर की दुनिया से कितनी अलग.
ReplyDeleteaur bhut kuch acha..hai..almost pura hi achhha hai...
very touching..
क्या ये सब सच है ??
ReplyDeleteभगवान् हमें इतना साहस दे, निर्णय करने का सामर्थ्य दे, कि हम भी जी सके स्वयं से ऊपर उठ कर.
पढ़कर आचा लगा, पर थोडा बुरा भी लगा :(
Wowwww.....Ise padhne ke baad muzhe bhi apne ek prashan ka uttar mil gaya kuch hadd tak...Thanks for sharing this.
ReplyDeleteपहली बार पढकर मन गुम सा हो गया, शांत होकर भी अशांत. फिर दुबारा से पढना शुरू किया. आपका हर अनुभव ज़िन्दगी के नए रंग, नए रूप दिखता है. कुछ पंग्तिया तो मानो आपके मन को चारो तरफ से घेर कर टटोल रही हो और पूछ रही हो कि तुम किस दिशा को अपनी दिशा बनाओगे? मैं ( उलझन और प्रशन) हर दिशा में तुम्हारे साथ चलूगा.
ReplyDeleteआपने ही तो लिखा कि,"उस रात मैं गंगा के किनारे उस भीड़ में खड़ा अपने उस अस्तित्व को ढूंढ रहा था, जो लाखों लोगो कि उस असीम श्रद्धा के बीच कहीं गुम था."
कुछ पंग्तिया मुझे बस गहरी सांस के साथ बहा ले गयी, जैसे कि ...
* मैं भी बहता रहा उस किनारे पर बैठकर
* जितना जानने की कोशिश करता हूँ उतना ही ज्यादा उलझता हूँ
* मैं थोड़ी देर के लिए अपने ही भीतर बैठना चाहता था
* जीवन के लिए ध्येय आवश्यक नहीं होता. संतुष्टि आवश्यक होती है
kan kan chitra hua sa........apna astitva dhoodhte hue hum.....hum sab kuch bhi hain kaheen bhi hain....par hum sab ka yahi sach hae..aur bhaiya mera confusion to aapse chupa bhi nai hae...the point here is not satisfaction or success..but self discovery.which u put very beutifully as"स रात मैं गंगा के किनारे उस भीड़ में खड़ा अपने उस अस्तित्व को ढूंढ रहा था, जो लाखों लोगो कि उस असीम श्रद्धा के बीच कहीं गुम था. "...the iitian sets an example......aur is sab k alwa aapki behtareen likhne ki kala....jo le gaye mujhe har ki podi tak...:)
ReplyDelete