Wednesday, June 8, 2011

बालकों को उनका बचपन दे सकें


मैं बस यूं ही निकल पड़ा था. रात के लगभग 11 बजे होंगे. होटल के कमरे के भीतर फिर बाहर की लॉबी में जब मन न लगा तो शाल लेकर मैं माल रोड पर निकल पड़ा. हवा ठंडी जरूर थी पर सुकून देने वाली थी. अन्दर बढ़ा, माल रोड की रौनक कम हो गयी थी. पानी में पड़ने वाली रोशनियों के प्रतिबिम्ब कई बार ऐसे कांपते से दीखते हैं जैसे फुटपाथ पर सोने वाले उस ठण्ड में कांप उठते हैं.  
 मेरे साथ मेरे साये के अलवा और कोई नहीं था. (अँधेरा आते ही वो भी साथ नहीं था) इस अकेलेपन में मेरे साथ कोई था तो झील. निस्तब्ध और शांत. 

मैं कच्ची सड़क पर था. मैं बहुत देर तक टहलता रहा था. और हर बार जाकर मेरी नजर एक ही जगह रुकी थी. रास्ते में झील के किनारे उस बेंच पर बैठी एक आकृति पर. मैं बहुत देर तक समझने की कोशिश करता रहा था. फिर लगा कोई मेरी ही तरह होगा जिसे कमरे की गरमाहट से बाहर की ठण्ड ज्यादा लुभा रही होगी. 
ठण्ड बढ़ने लगी थी. थोडा थोडा कुहासा भी ज़ोर मार रहा था. मैं वापस जाने की सोच ही रहा था कि पीछे से आई आवाज ने मुझे रोक दिया. "अगर आप और थोड़ी देर यहाँ हैं तो हम साथ साथ झील का एक चक्कर मार लें. मैं उस विनम्र आग्रह को ठुकरा नहीं पाया" सड़क के किनारे लगी बत्तियों कि रौशनी में पहली बार वो चेहरा दिखा. साठ पार कर चुका लेकिन एक तेजस्वी चेहरा जो ज़िन्दगी कि ठोकरें खाकर तपा होगा. उन्हें देखकर तो मुझे एक पल लगा कि उनका गाम्भीर्य इस झील को चुनौती दे रहा हो.
"मैंने बहुत दिनों बाद किसी नौजवान को इस तरह अकेले घूमते देखा है. मानो चेखव कि कहानी का कोई किरदार सड़क पर उतर आया हो. बहुत शांत और बहुत भावुक. इतनी रात को अकेले सड़क पर क्यों थे? पहले तो मैं चेखव का नाम सुनकर चौंक पड़ा. उनके इस वाक्य को मैं बहुत देर से समझ पाया. चेखव कि कहानियों के कई किरदार मेरी आँखों के सामने जिन्दा हुए और मरे"
"बस यूं ही - कमरे की घुटन से यहाँ कहीं ज्यादा सुकून मिलता है.
आप का परिचय?
मैं मेरा नाम अतुल्य पाठक है. नैनीताल  के उस ऊंचे पहाड़ के पीछे पंगोट के पास मेरा गाँव है. बचपन उसी गाँव में बीता इसलिए उसे अपना कहता हूँ. वैसे अपनेपन के लिए अब कुछ बचा नहीं है वहां. पर उन यादों का क्या करें जो पोटली की शक्ल में साथ साथ चलती हैं. 
मैंने पूछा कि यहाँ  - इतनी रात को आप अकेले?
मैं पिछले १३ सालों से हर रोज यहाँ आकर बैठता हूँ. अकेला. 
आप करते क्या हैं? मैंने एक और सवाल दागा.
कुछ नहीं करता. बस एक ही कोशिश करता हूँ कि जो जीवन में मुझे नहीं मिल पाया वो उन्हें दे सकूं जिन्हें देखकर यह लगता है कि उन्हें भी उसे पाने कि कोई सम्भावना नही. मैं समझ नहीं पाया. 
हम इन बातों के दरमियाँ वहीँ पहुच चुके थे जहाँ से सफ़र शुरू हुआ था, उन्होंने शाल के नीचे से कुर्ते कि जेब से एक कागज निकाला. उपर की जेब से पैन. कुछ लिखा और मेरे हाथ में थमाते हुए बोले - कल मिलेंगे. बस पलटे और विपरीत दिशा में चल दिए. मेरे सामने अँधेरे से भरी हुई सड़क थी. और दाहिनी तरफ धुंध से भरी हुई झील. मैं बहुत आहिस्ता आहिस्ता होटल की तरफ चल पड़ा कि यह था क्या? 
मैंने कमरे में जाकर कागज देखा उस पर लिखा था "स्नेह छाया"
मैने कागज  को देखा और सब कुछ सुबह पर छोड़ सो  गया, पता ही नहीं चला कि अगले दिन आँख इतनी जल्दी क्यों खुली. मैंने बस चाय पी. शाल उठाई और रिसेप्शन पर जाकर "स्नेह छाया" पूछा. पता मिल गया.
सूरज ने अभी अभी झील के साथ खेलना शुरू किया था. पूरा नैनीताल ठन्ड कि चादर ओढ़े पड़ा था. मैं फिर भी निकल पड़ा. पूछते पूछते एक मकान के सामने पहुंचा जिस पर लिखा था "स्नेह छाया" बाहर कुछ बच्चे खेल रहे थे. और उनके साथ खेलते हुए वही सज्जन. जो रात कि अपेक्षा कहीं जवान और तरोताजा दिख रहे थे. मैं उनके साथ भीतर गया. 
२३ बच्चे और मैं इस घर में बस हम ही रहते हैं. दिन भर खूब मस्ती करते हैं. खेलते हैं - पढाई भी खूब करते हैं. मार पिटाई भी. मस्ती भी खूब. 
ये बच्चे जब यहाँ आये तो इनका कोई नहीं था. आज इनके पास सब कुछ है.
मै केवल 3 साल का था जब माता - पिता का साया सर से उठ गया. और कोई था नहीं. पड़ोसे के एक चाचा ने पाला पोसा. उस पल पोस में  मैंने बचपन ऐसे बिताया कि मुझे अनुभव ही नहीं है बचपन होता क्या है. १३ साल का था जब उस गाँव से भागा. सड़क कि किनारे ढाबे पर बर्तन धोये. शहर भागा. काम किया, जो काम मिला वो किया  और फिर पढ़ा भी. डॉक्टरेट करने के बाद अच्छी अच्छी नौकरी के ऑफर थे. शादी नहीं की. मैं उनसे अपने अभाव दूर कर सकता था. पर अभावों  के सामने भाव जीत गए. मैं वापस लौट पड़ा. इन बालकों के रूप में अपना बचपन तलाशने. वही बचपन आज तक तलाश रहा हूँ. इनके साथ होता हूँ तो लगता है माँ -बाप सब साथ हैं. समाज के सहारे इस स्नेह के बंधन को जोड़ पाया हूँ. 
हर रोज झील के किनारे बैठकर यही सोचता हूँ कि क्या मैं सच में बालकों को वो दे पाया हूँ जो उन्हें मिलना चाहिए था. 
मैं चुप चाप बैठा सोच रहा था कि सच है या सपना. कोई कैसे जीवन का लक्ष्य यह बना सकता है कि - बालकों को उनका बचपन दे सकें - उनमे अपना बचपन ढूंढ सके. कितने लोग हैं जो जीवन को इतना आसन बना लेते हैं.
मैं भी थोड़ी देर बालकों के साथ खेला. कहानियां सुनाई, हंसा भी और हंसाया भी. उन्होंने सच कहा था. इन बालकों में अपना बचपन. यह एक नया शोध विषय था. 
मैं वापस लौटा. मन बहुत खुश था. उस अनजानी खुशी से.मुझे मिला क्या था? मैं इतना प्रसन्न क्यों था. मैं झील के किनारे उसी बेंच पर जा बैठा जहाँ मैंने पिछली रात उस आक्रति को देखा था. न जाने कितनी देर मैं वहां बैठा रहा. मैंने देखा कि माल रोड कि रौनक बढ़ने लगी थी.   
पर मुझे लगा कि ये रौनक उस व्यक्ति की मन की रौनक के सामने  से कितनी फीकी है. 

12 comments:

  1. kissi ko wo dena jo hume na mill paya for bettermnt....is reeli gr8...i hats off 2 dt person...

    nd olso watching sum1 living ur dream wich u av to gve up....mke us feel amazingly wonderful....


    wao.... i luvd dis 1.......<3

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  2. अभावो के आगे भाव जीत गए. सच कहा नील जी, जिस चीज़/प्यार की कमी इंसान खुद महसूस करता हो या की हो, वो अपने परिवार को उसकी कमी नहीं खलने देता. उस इंसान का हृदय बहुत विशाल है, जो उन नन्हे जीवन को सच में जीवन देने की कोशिश में लगा है. मैं जनता हूँ कि ये बातें सुनने में जितनी सरल और अच्छी लगती है, असलियत में करनी उतनी ही मुश्किल और चुनोती भरी है. भगवान् उन्हें इस मंगल कार्य में शक्ति प्रदान करे.

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  4. some of my fav parts....

    हवा ठंडी जरूर थी पर सुकून देने वाली थी.

    मेरी ही तरह होगा जिसे कमरे की गरमाहट से बाहर की ठण्ड ज्यादा लुभा रही होगी.

    सूरज ने अभी अभी झील के साथ खेलना शुरू किया था. मैं वापस लौट पड़ा. इन बालकों के रूप में अपना बचपन तलाशने. वही बचपन आज तक तलाश रहा हूँ. इनके साथ होता हूँ तो लगता है माँ -बाप सब साथ हैं. समाज के सहारे इस स्नेह के बंधन को जोड़ पाया हूँ.

    n

    उस अनजानी खुशी से.मुझे मिला क्या था? मैं इतना प्रसन्न क्यों था.

    kisi aur ko kush karke jo kushi milti hai na...bas uska ehssas kafi hota hai...use samjhaya nai ja sakta...

    bhut sundar hai..

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  5. कोई था तुम्हारे जैसा
    हा हा हा हा बढ़िया है
    खैर
    कुछ पंग्तियाँ बेहद खूबसूरत बनी है ...!

    हवा ठंडी जरूर थी पर सुकून देने वाली थी
    मेरे साथ मेरे साये के आलावा कोई न था
    होगा कोई मेरी तरह जिसे कमरे की गर्माहट
    से बहार की ठण्ड ज्यादा लुभा रही होगी
    कमरे की घुटन से कही ज्यादा सुकून मिलता है यंहा
    अभावों के आगे भाव जीत गए
    पता नही आप जिंदगी लिख रहे हो या फिर
    ये
    साजिश है जिंदगी की
    उसने खोज लिया है सुयोग्य पात्र
    और चिरंजीवी कलम ...
    भाई एक नितांत व्यक्तिगत निवेदन
    किसी यात्रा पर मुझे भी साथ ले चलो
    मुझे भी छपने का मौका मिले :) :) :)

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  6. first of all thanx to bhavya, aashu, dhruv a nd kushal..

    @ kuldeep ji - thnx.

    aapka nivedan padhkar hansi aa gayi.. arey bhai.. vo har charitra jo meri lekhni ke kendra me hai. vo tum hi to ho. tumhe nahi lagta ki har ek tumhara hi to kirdar hai jise koi or nibha raha hai. ek bar bharat ke aam aadni ko mahsoos karoge to lagega ki mere har anubhav ko tumne sath jiya. hai...

    thnxagain

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  7. @ Rahul bhaiya....

    मेरा किरदार
    और निभा कोई और रहा है
    रोयल्टी तो बनती है भाई .....

    खैर आप अच्छे हो
    और मेरे जैसा कोई भी आम इन्सान चाहेगा की
    झूठ ही सही एक बार मन रखने के लिए
    आप उसे ऐसा ही कुछ कह दें
    अच्छा है....
    आपका बद्दपन्न है की आपने ये कह भी दिया .....!

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  8. पढ़कर बहुत आच्हा लगा नील भैया, दिल को सुकून मिला, शायद मैंने अपने मन का प्रतिबिम्ब महसूस किया है इसे पढ़कर :)

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  9. bhaiya.. dis 1 iz really nice... maza aa gaya pad kar..

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  10. Wow rahul.
    AAj aapke liye respect aur bad gayi hai.
    Kitni pure thinking hai aapki.
    you are really awsm man.
    N nainital my place.. wow

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  11. wow...jankar acha laga k aaj bh duniya mein aise log hein jo doosron k khushi mein apni khushi dekhte hein..aur unke sapno ko poora krne k koshish krte hein..unko vo sab dena chahte hein jo unhe nai mil paya..!!!!sach wht a gr8 man..!!!


    n again ur writing is awsum n seedhe mann ko chuti hai...gr8 bhaiya..

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