Saturday, June 4, 2011

मैंने ऐसा सूर्यास्त नहीं देखा...

मैंने पहाड़ उतरना शुरू  ही किया था और मुझे ये अनुमान हो गया था कि मुझे गाँव पहुँचने से पहले अँधेरा हो ही जायेगा. इस घने जंगल वाले पहाड़ से ठीक नीचे वो घास वाला पहाड़ और उस से ठीक नीचे दाहिने हाथ को तिरौनी है (नैनीताल से 70 किलोमीटर ऊपर, मुक्तेश्वर के पास एक छोटा सा पहाड़ी गाँव) विक्रम(जिस मित्र के आमंत्रण पर मैं मुक्तेश्वर गया था.) से मैं सुबह यह कहकर निकला था कि बस अभी आया. और कैमरा और बैग  लेकर निकल पड़ा था. भे चराते भूटिया, या घास कि तलाशे के बहाने पहाड़ घूमती फिरती घसियारनो के साथ बतियाते बतियाते पता ही नहीं चला कि कब सूरज ढलने लगा था. दिन कि तीखी धूप अब गुलाबी होने लगी थी.
मुझे लगा कि अब लौटना ही होगा वरना मेरी खैर नहीं और बिना बताये चले आने पर घर में सुनने को तो मिलेगा ही. 
मैंने तेजी से वो जंगलों  वाला पहाड़ पार लिया. नीचे के पहाड़ पर मैं जरा सा दाहिने मुड़ा ही था कि मैं रुक गया. कैसे रुका नहीं जनता. पैर वहीँ के वहीँ जम गए थे जैसे. सामने वाले बर्फीले पहाड़ों के ऊपर बादलों में आग लगी थी.  सामने का पूरा आसमान नारंगी रंग में रंगा था. और बाकि नीला इतना साफ नीला था कि मुझे यह बात सच लगी कि आसमान के उस पार कुछ भी नहीं. अगर कुछ होता तो उस दिन दिख गया होता.
सूरज और पहाड़ के बीच में के बादलों के कोने आग से चमक रहे थे. मुझे लगा कि कोई शरारती पहाड़ी बालक कहीं इन बादलों में आग तो नहीं लगा आया चुपके से. और ये बेखबर बस तैर रहे हैं इधर से उधर. आदमी की तरह. जिसके भीतर ना जाने कितना कुछ जल रहा होता है और वो फिर भी भाग रहा होता है कहीं और किसी और आग के पीछे. जैसे ये बादल अपनी आग से बेपरवाह बहे चले जा रहे थे सूरज कि तरफ. सूरज पहाड़ के बिकुल सिर पर जा खड़ा हुआ. मानो अधिकार हो उसका.
अब मेरे उस पहाड़ और सूरज के  बीच कुछ था तो वो थी वो पहाड़ी नदी जो तरौनी के उत्तर से बहती है. मैंने नदी में देखा तो एक बार लगा कि कोई पिघलता हुआ लोहा तो नहीं बहा आया है नदी में. पानी कहाँ गया? नदी एक संतरी रंग की लकीर सी दिखने लगी. ये कैसा माया जाल है. मुझे इस वक़्त सूरज एक बहरूपिये सा लगता है. पल पल ऐसे रंग बदलता है मानो कोई छोटा सा बालक जिद पर अदा हो. मैं तो बस इतना जनता हूँ की ये सूरज बहुत भुलक्कड़ है, उसे बस इतना ही याद रहता है सुबह पहाड़ के पीछे से बिना नहाये धोये उठ आना और शाम को बिना बताये पोटली उठाई और निकल अड़े. बंजारे सा सूरज.

मेरे सिर के पीछे से सैकड़ों चिड़िया एक साथ निकलीं. अरे इन्हें कौन डाकिया चिठ्ठी दे आया कि लौट चलो अपने घर - कोई राह ताकता होगा. सूरज तो डूबने वाला है. कौन होगा इतना माहिर डाकिया? चिड़ियों कि उस मीठी आवाज से आकाश भर गया. कितना पवित्र है सब कुछ, सैकड़ों चिड़ियाँ  इस आसमान से गुजर गयीं - आसमान फिर भी उतना ही साफ है. और कहीं से सौ लोग गुजर जाएँ तो वहां इतनी पवित्रता क्यों नहीं होती?
सूरज का रंग गहराने लगा था. किसी भी पल वो पहाड़ के पीछे से कूदकर  आत्महत्या कर लेगा. मुझे यही लग रहा था. बड़ी तेजी से रंग, रूप बदलता है. जैसे कोई बड़ा ही कुशल चित्रकार अपनी कूचियाँ लेकर बैठा हो. जो हर पल एक नया कैनवास सामने रख देता है. 

रंग गहराने लगे जंगलों के, घास के, पहाड़ की उस उपरी लकीर का रंग जो उसे आसमान से अलग करती है. मैं विचार शून्य हूँ. सूरज को देख रहा हूँ जैसे अभी और जीना चाहता है. अंतिम समय में भी जीवन भर की सुख संतुष्टि के चिन्ह साफ साफ उसके चेहरे पर हैं. साफ साफ. और बादलों से आखिरी बात करना चाहता है. जैसे सबसे बेहतरीन दोस्त से दूर जाने से पहले कुछ कहना चाहता हो. 
अचानक कहाँ गया सूरज. आत्महत्या या नियति? आसमान और गहराया तो नारंगी से सुर्ख सिन्दूरी हो गया. मैं वहीँ बैठ जाता हूँ. देखना चाहता हूँ वो जीवन के चिन्ह जो जहाँ तहां बिखरे पड़े हैं. सोचता हूँ  कि दुनिया को जीवन देने वाला क्या अपने अंतिम समय में इतना निसहाय हो जाता है कि अंतिम साँस भी न ले सके. क्या हम सब के साथ यही होता है. फिर मैं और सूरज अलग कैसे हुए. दोनों ही तो असहाय हैं.
मुझे होश आया तो मैं अँधेरे से घिरा था. मैं उठा और सोचा कल सुबह इस सूरज से पूछुंगा कि क्या मिला मुझे इस माया जाल में फंसाकर...

6 comments:

  1. Great bhiya, you're on a trip alone?? the description of time and place makes me feel jealous, I want to be there as well :x :)
    Nice pictures you've clicked, by the way ;)
    Fabrication of sentences could've been more natural and simple :)

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  2. नील जी, आपने शब्दों को फसाया, तो क्या सूरज आपको नहीं फसा सकता? आप बिना खोये किसी के भीतर कैसे हो पायेगे? सूरज को निहारना भी है लेकिन खुद को समेटे हुए.... ऐसा नहीं हो सकता नील जी. खोना तो पड़ेगा, चाहे आप सूरज में खोये या सूरज आप में..:)
    प्यारी लगती है आपकी कुदरत से नोक-झोक, निस्वार्थ से प्रशन, कभी आसमान से तो कभी रंगों से, कभी लहरों से तो कभी पहरों से....चलते रहिये न जाने कब कहा "वो" मिल जाये जिसकी सबको तलाश है.

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  3. bahut aacha bhaiya.......padh nahi paya main samay par buh meri hindi ki kitaab khatam nahi hui.....i love it....

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  4. sabdho ka aacha sanyojan hai or soch ke sath aacha samayojan bhi hai badiya hai

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  5. इन्हें कौन डाकिया चिठ्ठी दे आया कि लौट चलो अपने घर - कोई राह ताकता होगा. waaahhhhhh

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  6. :).....banjara suraj.....kahan gaya suraj aatmhatya ya niyati......the best part of ur writting is ur simplicity jo ekdam hit karti hae.aur usko gehrai se reality k saath jodna...amazing bhaiya.."phir main aur suraj alag kasie hue.dono asahaye"...yeh maya jal he to hae bhaiya jo hum sab is itni logical zindagi main rehte hue bhi kaise kabhi kabhi bas ruk jaate hae yuheen...

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