Friday, June 3, 2011

अपना बोझ खुद ही उठाना बेहतर है.



कल के शहर की तरह आज के इस शहर ने अभी तक रफ़्तार नहीं पकड़ी थी रफ़्तार थी ही नहीं शायद. एक सूखा हुआ सा ठहराव सा - जो शांति देता है. भीतर तक सब कुछ रुका सा. बाद में उज्जैन में घूमते हुए मुझे लगा की यह ठहराव कहीं इस शहर की नियति तो नहीं. जिसे इस शहर ने बहुत शालीनता से स्वीकार  कर लिया था. हालाँकि बहतु कुछ ऐसा है जो साथ साथ चलता है, भागता है, दौड़ता भी है पर लगता है कि यह  ठहराव का अपना दर्शन है. दर्शन जो गति और स्थिरता के सापेक्ष चलता है.
सुबह सुबह उज्जैन पहुंचा. सूरज ने क्षितिज को छुआ तो शिप्रा (उज्जैन से होकर बहने वाली पवित्र नदी कहते है कि वो भी गंगा का ही एक अंश है जो महाकाल के साथ उज्जैन आई थी.) में पड़ रही सूर्य रश्मियों ने स्वागत किया. मुझे लगा कि यह जल ही तो है जो सूर्य रश्मियों के व्यक्तित्व को विस्तार देता है. विस्तार रूप का,  विस्तार गुणों का. 
मध्य भारत के इस क्षेत्र का अपना एक आकर्षण है. एतिहासिक भी,सांस्कृतिक भी और पुरातात्विक भी. यहाँ बुंदेलखंड और मालवा के बीच की संस्कृतियों के दर्शन खूब होते हैं. यहाँ चारों और से पहुँचने का रास्ता खूबसूरत है. हर थोड़ी थोड़ी देर में landscape बदलता है. भूरे रंग की खूब बहुलता है. भूरे रंग के इतने shades मैंने कहीं नहीं देखे. कई बार तेजी से पीछे भागती धरती अपने साथ ऐसा कुछ ले जाती है, जिस पर मन ठहरता था, टिकता था. फिर वही ठहराव का अपना दर्शन.
इन landscapes के साथ साथ समय भी बदलता है. सूरज सिर पर चढ़ा चला आ रहा है. सूरज सूखेपन को और गहराता है. भूरे रंग के कई और shades उभरते हैं. दूर तक दर्शन कक्षा में आँखे चुंधियाती हैं.
मैं शिप्रा के किनारे जा बैठता हूँ. सामने हरे पानी वाली शिप्रा. जैसे पानी से किसी ने उसका पनियालापन छीन लिया हो. और बदले में उसे हरा कर दिया हो. वह बैठकर पता ही नहीं चलता कि शिप्रा बह रही है या रुकी है. या कहीं कुछ देर के लिए ही तो नहीं रुकी मुझसे बतियाने को.
घाट लगभग खली है. दूर घाट की सीढ़ियों पर 2 प्राणी बहुत निर्लिप्तता के साथ, बैठे थे. बूढा और एक बूढी. 
मैं उधर चला जाता हूँ. मेरी और उनकी पीठ थी. सीढ़ियों पर २ पोटलियाँ रखीं थी. उनके बिलकुल नजदीक. मानो जीवन भर की पूँजी हो. दोनों के पांव पानी में थे. तन पर कपडे लगभग ना के बराबर. खिचड़ी बाल. और दोनों अपने में मस्त. दोनों अपने में बतियाते हैं. हसंते हैं. मानो यही उनकी दुनिया हो. अपनी ही परीधियों में बंधे होते हुए भी एक दूसरे से बिना आधारहीन से.
मैं दोनों के पीछे जा बैठता हूँ. उनकी बातें सुनने की कोशिश. बस जानना चाहता हूँ कि उनकी इस समता का आधार क्या है? दोनों नहाते हैं. मैं वहीँ बैठा हूँ. बीच बीच में मुझे देखते हैं. मैं उन्हें लगातार देख रहा हूँ. थोड़ी बहुत बात शुरू होती है.
राजस्थान के एक कस्बे से कहानी शुरू हुई. जिंदगी भर की खूब कमाया. बच्चों की पढाया, लिखाया और फिर हर अच्छे माँ बाप की तरह उनकी शादी भी. भरा-पूरा परिवार. बेटे, बहुएँ, नाती, पोते सब कुछ और हमें बहुत चाहने वाले. भगवन ऐसा 
लेकिन एक दिन जब लगा की कन्धों पर तने-तने जब गर्दन दुखने लगी ना तो लगा कि ये गर्दन जो जीवन भर किसी के आगे नहीं झुकी. शायद अब भगवान जैसी किसी चीज के सामने झुकना चाहती है. हमने सब छोड़ दिया. 
(बुढिया ने पोटली से एक बर्तन निकला, उसमे से 5 रोटियां. 2 बाबा को, 2 मुझे और खुद एक, उसी झोले से 2 प्याज. एक बाबा को और एक मुझे, बूढी माँ प्याज नहीं खाती. बस खिलाती है.)
हम निकल पड़े. जहाँ भगवान का आभास होता है. वहीँ झुक जाते हैं. जहाँ कोई सज्जन मिला उसकी संगत ले ली. जब किसी को हमारी जरूरत होती है तो हम वह होते हैं. उर छोटे परिवार से बाहर निकलकर हमने बहुत बड़े परिवार को पा लिया. जहाँ जो मिलता है खाते हैं. खुले आसमान के नीचे. धरती कि गोद में जहाँ जगह मिल जाए वही अपना घर. जहाँ मन  होता है वहां घुमते हैं. इस उन्मुक्तता में बहुत बड़ा सुख है बेटा. हम जानते हैं कि हमारे लिए बहुत मुश्किल था घर छोड़ना. जिनके पालन पोषण में हमने जवानी घोल दी. फिर उन्हें खुद ही छोड़ आये.
मैं जानता हूँ कि तुम पूछोगे कि क्या उन सब कि याद नहीं आती क्या? आती है बेटा. हम साल में एक बार जाते हैं मिलने. दस दिन उनके साथ रहते हैं. बेटो ने काम और बढ़ा लिया है, अच्छा लगता है. दस दिन बाद फिर इसी दुनिया में. 
बुढिया ने पोटली उठा ली. "चलो! कीर्तन का समय हो गया" मेरी तरफ घूम कर बोली. तुम चलोगे. मैं पीछे पीछे चलता हूँ. बूढी माँ से पोटली लेने कि कोशिश करता हूँ. मना करती है कहती है कि आज तुम ले लोगे कल कौन आएगा? अपना बोझ खुद ही उठाना बेहतर है. 
मेरे कदम छोटे हो जाते हिं. सामने के आश्रम में भागवत कथा चल रही है.  कथा वाचक यक्ष- युधिष्ठिर के माध्यम से जीवन का दर्शन समझा रहे हैंदोनों झुकते हैं और फिर भीड़ में जाकर खो जाते हैं. मैं बाहर खड़ा हूँ.. पता नहीं कब तक. मेरा मन बहुत स्थिर है और मुझे नहीं पता कि शिप्रा अभी तक मेरी बाट में अभी भी थमी है या बहने लगी है....... 
  





6 comments:

  1. Puri life bachcho ke liye ji dali...
    ab kuch apne liye ji rhe hai....
    nice...

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  2. जिंदगी कितने ही रंगों मैं
    बिखरी पड़ी है हमारे आस पास
    शायद हम ही कुछ देर रूककर उससे
    ठीक से देख नही पाते
    भगवन ने आपको ऐसी दृष्टि दी है
    की आप ये सब देख लेते हो
    कुछ देर को जिंदगी के ठहराव को
    ठहरकर उसके साथ साक्षात्कार कर लेते हो
    जीने की सीख बदन पर
    दो कपडे डाले किसी भी अजनबी से ले लेते हो
    बहुत ही चालक और काबिल इन्सान हो
    लोगों के जिंदगी खपाकर कमायें तजुर्बों
    को यूँ मस्ती मस्ती मैं ले लेते हो
    जिन्दा है सिखने की ललक
    हमेशा हमेशा ..........!

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  3. srijan.......
    shankar ka ho........ya brahma ka.
    dono hi nirman kartey hain......
    wo insan ho ya uska bhagwan ...
    dono saath jeetey hain....saath martey hain.
    budhi maa ki jhuriyaan dhyaan se dekhana.....
    usney shayd dharti ko hi thama hoga...
    jo nau mahiney tak....
    andar bhagwan ke insan ka srijan karti hai....
    potli kya hai uske liye?????????????
    usney to bhagwan utha rakha hai.

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  4. dhanywad kuldeep ji.. pr mere pas or rasta hi kya hai jeene ka.
    @ somu thnx
    @ gaurav ji.. aapne shi kaha. hai per apne wanprasth ko unhone jis parivrajak roop me srujit kiya vo wastav me mahan hai.

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  5. Super duper like..and kuldeep's comment is awesome...

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  6. त्याग और विश्वास का अतुलनिए उदाहरण. आपके लेख ये विश्वास दिलाते है कि दुनिया में अच्छाई अभी जिन्दा है. और आपके ज़िन्दगी से प्रश्न पूछने का अंदाज सच लगता है.

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