यात्रायें आपको अनुभव देतीं हैं. यही सुना था. यात्रायें संवेदनाएं जगाती हैं यह अनुभव हुआ था. आज तक दुनिया के जितने रंग देखे - यात्राओं में देखे. सपनो की उड़ान भी और परवाज़ की सिमटन भी, जिंदगी के गहरे रंग भी और अनजान ठोकरों सब यात्राओं में मिला था.
बारहलाछा दर्रा पार करके हम बस यूँ ही चले आये थे यहाँ तक. कल्पना से परे मैं एक परीलोक में घूम रहा था. मानों वे गहरी घाटियाँ मेरे भीतर उतर रही थी. नदी मेरे भीतर एक नया मोड़ ले रही थी. मैं बादलों के बीच में अटका खड़ा था. बारिश की हलकी हलकी बूँदें मुझ से कितनी ही देर बेपरवाह टकराती रही थी. मेरे साथी ने कन्धा हिलाकर कहा - चलो वापस किलोंग पहुंचना है. मैं गाड़ी में जा बैठा. निगाहें खिड़की के बाहर उन पहाड़ों में मानो कुछ खो गया था मेरा.
वापसी में चार घंटे लग गए. सिर दर्द बढ़ता ही जा रहा था. मैं होटल पहुंचा तो सीधे बिस्तर पर. सोने की कोशिश पर नाकाम. मैं उठकर होटल के रिसेप्शन पर गया. डॉ. के बारे में पूछा तो पता चला की वहां कोई डॉ. नहीं है. केवल एक सिविल हॉस्पिटल है वहां शायद डॉ. मिल जाये. मैं पैदल ही चल पड़ा. इस क़स्बे के बिलकुल दूसरे कोने पर सिविल हॉस्पिटल. वहां पहुंचा डॉ. मिल गए. एक स्पेशल केस देखने के लिए वो आये हुए थे. मैंने दवाई ली. वापस.
होटल जाने का मन नहीं था. मैं दूसरी तरफ चल दिया. शाम हो रही थी. ठंडी हवा. जिस्पा नदी की डराने वाली आवाज.
घाटी हरे रंग से पुती थी. पहाड़ों के चोटियों से बादल खेल रहे थे.
कोई भी ऐसे में थोड़ी देर बैठना चाहेगा. ये वो शांति थी जो हमेशा के लिए आपके भीतर जा बैठती है. आँखों के सामने जब जब भी ये दृश्य होता है मैं तब तब उस असीम शांति का अनुभव करता हूँ.
शहर कोई २ मील पीछे छूट गया था. नदी के टकराव की आवाज और तेज हो गयी थी.
थोड़ी देर में अँधेरा गहराने लगा था. मुझे कोई एक फर्लांग दूर एक रौशनी दिखी. मैं आगे चलता गया. थोडा पास आने पर कुछ आकृतियाँ भी हिलती दिखाई दी. पर घर जैसा तो कहीं भी कुछ नहीं था. मैं पास पहुंचा, थोडा सा उपर चढ़ा, एक प्लास्टिक की पन्नी से ढका टेंट लगा था. बाहर कुछ लोग आग के पास बैठे थे. मैंने आग की रौशनी में गौर से देखा तो पता चल गया कि ये स्थानीय लोग तो नहीं हैं.
मैं साथ जा बैठा. कुछ चार लड़के थे. उम्र २० से ज्यादा किसी कि नहीं थी.
ये चारों बिहार के आरा जिले के रहने वाले थे.
बिहार से इतनी दूर घूमने?
मैंने गलत सवाल पूछ लिया था शायद.
नहीं हम यहाँ सड़कें बनाते हैं. कुछ लोग सड़कें बनाते हैं, ठीक करते हैं और कुछ लोग पहाड़ गिरने का इंतजार करते हैं कि पहाड़ गिरें तो उन्हें हटाने जाएँ.
मैं बहुत चुप चाप उन्हें देख रहा था. तभी एक अधेड़ आदमी भीतर से एक गिलास में चाय ले आये. बिना दूध की चाय.
सूरज १९, सतीश १८, रामकुमार २० और राजू २०. तीनों की ३ साल हो गए हैं.
सतीश ने बताया की रोहतांग से कीलोंग तक की सड़क बनाते वक़्त उसके दादा और पिताजी भी सड़क बनाने वालों में थे. एक बार पहाड़ गिरा और वो दोनों ही उस हादसे में नहीं रहे. बड़ा भाई भी यही हैं लेह के पास. सड़कें ठीक करता है. उसका गला रुंध गया था. बात अजीब सी थी,
कहाँ बिहार और कहाँ कीलोंग. किस्मत की न जाने कौन सी सड़क उन्हें यहाँ ले आई थी.
मैं उनसे बैठा बातें करता रहा. सतीश का परिवार भी जिस्पा के पास के ग्रुप में है. राजू पिछली बरसात में बाल बाल बच गया था.
मैंने सोचा की विषय बदलने की जरूरत है शायद.
"आसपास घूमने की अच्छी जगह कौन कौन सी हैं"
वे आपस में एक दूसरे को देखने लगे.
"हमें क्या पता?" राजू बोला. उसकी आँखों में जो निरीहपन था, वो भीतर तक घुस गया था मेरे.
हमें तो बस सड़कें ही अच्छी लगती हैं. कुछ और देखा ही नहीं अभी तक. लोग कहते हैं की आगे बहुत कुछ सुंदर है. तीन साल हो गए हैं आये हुए. हमारे पास ये २० किलोमीटर का इलाका है. हर रोज बस आप जैसों की हिफाजत के लिए यही से उगता सूरज देखते हैं और यहीं से उसे डूबते हुए. दिन भर हम बस यही रहते हैं सूरज ही आता जाता है. ऐसे ही सबके हिस्से बंटे हैं. हमें हमारे काम से मतलब है. वरना ये जो गरम चूल्हा देख रहे हैं न ये ठंडा पड़ जायेगा.जो नज़ारे और जो पहाड़ आपको खूबसूरत लगते हैं ना हम हर रोज डर डर के उनके साये में जीते हैं.
मैं उठ पड़ा. भीतर जाकर देखा. एक कमरे लायक जगह थी उसमे ७ लोग रहते हैं. यही था उनका राज महल.
दोस्त होटल में इन्तजार कर रहे होंगे. मैं वापस मुड़ा.
तो इन नौजवानों का एक एक शब्द मेरे साथ चहलकदमी करने लगा. जाते हुए मैं जितना शांत था आते हुए उतना ही उथल पुथल से भरा था. इन तरुणों की हाथों की लकीरों में ऐसा क्या है की ये इतने बंधे हैं. दो जून की रोटी के आगे की दुनिया के लिए उनके रस्ते बंद हैं. क्यों?
क्या प्रकृति के मायने हम सबके लिए इतने अलग अलग हो सकते हैं. मैंने कभी सोचा ही नहीं था. दिन के चोकलेटी पहाड़, बसंती हवा. बर्फ से ढके धवल शिकार मैंने जिनके कारण देखे..मेरा मन उनके लिए एक अनजानी कृतज्ञता से भर गया. नदी अब और तेज दहाड़ने लगी थी. पर सतीश के शब्द मेरे कानों में ज्यादा शोर मचा रहे थे.
आज मैं घन्टों उन चोकलेटी पहाड़ों के सामने खड़ा रहा था. जिनमे जगह जगह बरफ भरी पड़ी थी. यह सब कुछ सम्मोहन से भरा था. आने से पहले नहीं सोचा था कि यात्रा का प्रतिफल इतना खूबसूरत होगा.
after reading dis i ws jst silent...nd ws lost 4 a bit...nw i cn imagne hw many questions u mst be havin in ur mind dt tym....
ReplyDeletedose guys r stayin in a place whr nething cn hppn ne secnd...dey r scared...more dn dat dey still living in dt place for oders safety ...gr8 job
nd ya as u said...."prakriti ke manya"...dey r diffrnt for evry1....
dis 1 is actually diffrnt.....i lykd it alot.....<3
thnx bhavya,,, actully a difrent mean for dem
ReplyDeletebut tought to live nd accpt.
आपके लिखने से पहले ऐसा कभी सोचा ही नही. शायद हर एक कि ख़ुशी के पीछे किसी की उदासी छिपी होती होगी. "प्रकृति के मायने सबके लिए अलग क्यों है", शायद इसका उतर न दे सकू. लेकिन आपके इस लेख ने सोचने पर जरूर मजबूर किया कि क्यों हर कोई सीमाओ में बंधा रहता है?
ReplyDeleteहमेशा की तरह आपका अकेले चल पड़ना, बिना मंजिल सोचे, रास्ता समझे. हम तो सब वक़्त के गुलाम बन बेठे है. ऐसे में आपका बेपरवाह सा चलते जाना, कही न कही सकून देता है.
"इन तरुणों की हाथों की लकीरों में ऐसा क्या है की ये इतने बंधे हैं. दो जून की रोटी के आगे की दुनिया के लिए उनके रस्ते बंद हैं. क्यों?"
ReplyDeleteतुम्हारी चिंता स्वाभाविक है नील. लेकिन इनकी तुलना करोगे तो किससे? क्या उससे जो अपने मोहल्ले के ढाबे में बर्तन धोने में ज़िन्दगी गुजार रहा है और खुली हवा में सांस लेने जैसी बातें केवल रेडियो में सुनता है? हर व्यक्ति और उसकी परिस्थिति इस दुनिया में unique है. मैं जहां भी खड़ा होता हूँ, मुझसे आगे भी एक अनंत दुनिया है और मेरे पीछे भी लम्बी कतार है. वास्तव में ये "आगे-पीछे" और "ऊपर-नीचे" तो मेरे दिए हुए शब्द हैं....
nice...... liked it....... :)
ReplyDeletebeauty...has different means for every person..
ReplyDeletethe place that seems so beautiful to us...has reverse effect on them..maybe becoz they lost their loved ones...in the mesmerizing beauty...n have a fear of losing their lives to...
a place that has nature at its best...has no means for them they are there..just to earn n live...
it maybe at peace,the beauty for us..but the real thing is known by them...
a thing like the real beast bheind the beauty.
and a big thanks to them..
becoz of their work ..ppl like us are able to reach such eye pleasurable and beautiful place..
life teaches us what to die for,
ReplyDeletedeath teaches us what to live for....
ye un ladko per puri tarah fit hota hai ....
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ReplyDeleteकुछ लोगो को लगता है वे संवेदनशील हैं,
ReplyDeleteकुछ लोग होते संवेदनशील हैं,
कुछ लोग जीते हैं संवेदनाओ को
आप ऐसे ही हो
और भाई जीना इसी का नाम है .....!
अच्छा लगता है
आपके ब्लॉग पर कुछ नया,
नए नजरिये से देखते हुवे पढना
और साथ ही आपके मित्रों के cmnts
भी शानदार और प्रेरक होते हमारे लिए ....
कुछ पंग्तिया जो दिल को छूती हैं
1- किस्मत की न जाने कौन सी सड़क उन्हें यहाँ ले आई थी.
2- जो नज़ारे और जो पहाड़ आपको खूबसूरत लगते हैं ना हम हर रोज डर डर के उनके साये में जीते हैं.
कुशल जी - हमेशा की तरह आपका अकेले चल पड़ना, बिना मंजिल सोचे, रास्ता समझे. हम तो सब वक़्त के गुलाम बन बेठे है. ऐसे में आपका बेपरवाह सा चलते जाना, कही न कही सकून देता है.
विजय भैया - मैं जहां भी खड़ा होता हूँ, मुझसे आगे भी एक अनंत दुनिया है और मेरे पीछे भी लम्बी कतार है. वास्तव में ये "आगे-पीछे" और "ऊपर-नीचे" तो मेरे दिए हुए शब्द हैं....
rily different...nyc 1 ..!!
ReplyDeletehalaat hi mazboor kr deti h...
kuldeep ji.
ReplyDeletekahin na kahin aap jaise logo ki prerna hi meri is urja ka sambal hai.
aapke shabd prerna bankar hamesha mere sath hote hain. ki main har cheej ko apne dhang se dekh paata hu.
aapko pata hai, likhte waqt main sochta bhi nahi hu ki aap log itna sarahenge mujhe. per .....
yahi prerna mere satha hamesha bani rahe..
yahi vinti..
thnx for all the support.
Chaudhari saab,
ReplyDeleteमैं जी भी हो गया और मुझे पता भी नही चला
खैर
अगर आप प्रेरणा के साथ रहना चाहते हैं
तो रहिये ......
बस मेरी बी. जे. का क्या होगा भाई ???
Ha ha ha Sorry...:) :) :)
i was there for a while.....written as beautifully as always....bhaiya you talked about the peace the biss the place has in it and wahan k log jo wahan rehe hue bhi uska anubhav nahi kar paa rahe and ironically they have fears......and funnily enuf i feel thts the beauty of life..everything so differrent but merged so well together..mother nature.
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