Friday, July 8, 2011

और यह लड़की???



मैं बागडोगरा हवाई अड्डे से बाहर निकला, बाहर के हालत कुछ अजीब से थे. कोई बस नहीं, टैक्सी नहीं. हवाई अड्डे से सिलीगुड़ी शहर 8 किलोमीटर दूर है. पता चला कि आज "बंद" होने के कारण यहाँ कोई साधन नहीं मिलेगा. ऐसे समय में आप बहुत बंधे होते हैं जब अनजानी जगह पर कुछ भी नहीं सूझता.8 किलोमीटर की पैदल यात्रा, सामान के साथ-जिंदगी में एक और ना भूलने वाला अनुभव जुड़ गया. थोड़ी देर पहले मैं आसमान में उड़ रहा था और अब वापस उसी जमीन पर था. मुझे एक बार फिर लगा कि जमीन से जुड़े रहना ही हेमशा बेहतर होता है. शहर पूरा बंद था. किसी आबाद शहर में इतनी वीरानियत.. कहीं न कहीं ये विकास की देन है जो हमने बहुत मुस्कुराते हुए स्वीकार की है. घर बंद, दुकानों पर ताले, जैसे पंछियों ने भी कहा आज हम भी मनुष्यों का साथ देंगे. 

मुझे नहीं पता कि उनका अनुभव कैसा रहा होगा. पर मैंने ऐसा शहर कभी नहीं देखा था. जो जानबूझकर आँखें मूंदे सोया था.बा-मशक्कत एक होटल मिला. मैंने गंगटोक तक के लिए टैक्सी के लिए पूछा. "6 बजे से पहले कुछ नहीं मिलेगा आज बंद है बंद". जिस से भी पूछा सबका एक ही सीधा सपाट सा जवाब. और वैसे भी 6 बजे के बाद वहां जाने को कौन तैयार होगा, बारिश का मौसम है, इतना रिस्क कौन लेगा? इस लिए बेहतर है कि आप आज रात यहाँ रुक जाये और सुबह निकल जाएँ. मेरा किसी भी हालत में रात तक गंगटोक पहुंचना कितना जरूरी था. ये कोई नहीं जानता था. सिलिगुरी से 5 -6 घंटे लगते हैं. मैंने बहुत उपापोह की स्थिति में होटल में शाम तक रुका.
पूर्वोत्तर में ६ बजे अँधेरा हो जाता है. फिर भी मैं सामान के साथ बहार निकल गया कि मैं अपनी ओर से कोशिश कर लूं. आगे की राम जाने. होटल से दाहिनी ओर एक चौराहे पर मैं अपने सामान के साथ खड़ा था. सड़क पर आवाजाही बढ़ गयी थी. पर बहुत कम. 2 -3 टैक्सी वालों से पूछा - नहीं इस समय नहीं और फिर पहाड़ भी बरस रहा है. आपने कभी पहाड़ की बारिश नहीं देखी क्या? जो इस वक़्त जाने की पड़ी है. मैं चुपचाप खड़ा था. पहुंचना भी जरूरी था. और रास्ता कुछ नहीं. मैंने सोचा कि जब कायनात यही चाहती है तो फिर यही सही. मैंने वापस रुख पकड़ा ही था की एक मार्शल मेरे पास आकर रुकी. ड्राइवर की सीट वाली खिड़की से एक सिर बाहर निकला.कहाँ जाओगे? मैंने बिना कुछ ध्यान दिए बोल दिया - गंगटोक.
लड़की थी. लड़कों की भूषा. सिर पर टोपी. उम्र का अंदाजा नहीं लगा उस झलक में. अचानक बोली. रिस्क तो है पर मैं चलूंगी. रुक कर बोली. - ऐसा क्या जरूरी काम है. सामान पीछे रख दो और बैठ जाओ. मैं देखती हूँ कोई और सवारी मिलती है तो. मुझे तो शोले की बसंती याद आ गयी.
बक बक बक बक.   
खैर यात्रा शुरू हुई. मैं डरा हुआ था, क्योंकि पहली बार ऐसी  टैक्सी में बैठा था जिसे एक लड़की चला रही थी. सिलीगुड़ी छोड़ने के बाद बारिश तेज होने लगी, सड़क पर इक्का दुक्का वहां ही आ रहे थे. पहाड़ी क्षेत्र शुरू होते ही बारिश और तेज होती चली गयी. मैं इस बात से बिलकुल बेखबर बैठा था कि मैं अपनी जिंदगी मैंने अपनी जिंदगी के सबसे खतरनाक रस्ते से गुजरने वाला था. घुप्प अँधेरा, तेज होती बारिश. तेज रफ़्तार से भागती गाडी और लगभग अनाड़ी ड्राइवर. पिछले जन्म का कोई कर्म?
कोई सपना छितरा छितरा गया हो जैसे. सामने बिजली कड़क रही थी. गाड़ी की एक लाइट ख़राब थी. एक ओर रौशनी की कमी खल रही थी. और दूसरी ओर सामने की रौशनी मन में बस डर भर रही थी. कितनी अलग अलग भूमिका. 
मैंने डरा सिमटा बैठा था. बादल फटे पड़े थे. पहाड़ों से पानी के झरने ऐसे बह रहे थे की रेगिस्तान में बरस गए होते तो शायद वहां भी अंकुर फूटने की उम्मीद जग जाती. यही कुदरत है. उसे पता है कि किस के सामने कितने ओर कब बसना है. गाड़ी में पानी भर रहा था. सड़क पर पानी कितना था पता ही नहीं चल रहा था. 5 मीटर से ज्यादा देख पाना संभव नही था. पानी अंदर आ रहा था. नीचे से भी ओर दरवाजों से भी. एक खिड़की का पल्ला जो  नहीं था. अगर एक चीज कम नहीं हो रही थी तो वो थी  गाड़ी की रफ़्तार और बारिश की धार.

आँखें अपने आप बंद हो रही थी और होंठों पर प्रार्थना स्वयमेव आ रही थी. 
और कुछ रास्ता भी क्या था. मेरे साथ बैठे दोनों व्यक्ति बार बार मुझे देख रहे थे और मैंने  अपनी उस सारथि को. उसके हाथ स्टेयरिंग पर ऐसे फिसल रहे थे जैसे कोई बच्चा फिरकी चलता है. उसका चेहरा अभी भी उतना ही विश्वास से भरा था जितना पहली झलक में था.  मेरे लिए यह सफ़र किसी वैतरणी को पार करने से कम नहीं था. मैंने समय देखा. डेढ़ घंटा बीत चुका था. मैं अपने कई साथियों को संदेसा भेज चुका था की मेरे लिए प्रार्थना करें.
कई बार जान गले तक आ गयी थी. फिर वापस. मुझे उस रात यह एहसास हुआ की कहीं न कहीं ये क्षण हमें ईश्वर के कितने पास ला छोड़ते हैं. मैं प्रार्थना में था. बारिश और भयानक हो गयी थी. मैं कितनी देर उस प्रार्थना में था. आँख खुली तो हम एक नदी के किनारे थे एक ढाबे पर. यह तीस्ता नदी थी. सिक्किम की सबसे बड़ी नदी. बारिश कम हो गयी थी. ऐसा लगा जैसे कोई डरावना सपना अभी अभी टूटा हो और मैं उसके रहने के चिन्ह अभी तक जस के तस पड़े हों.
मैं बहुत चुप था. समझ में नहीं आ रहा था की उस लड़की का धन्यवाद दूं. या खुद से सवाल करू कि क्यों 4 जानों को मैंने मुसीबत में डाला. 
आगे रास्ता बेहतर था. वो आसाम कि रहने वाली थी. उसका नाम नीमा था. अब तक केवल गर्दन हिलाने वाली उस लड़की ने बातचीत शुरू कि. मेरा गंगटोक पहुंचना जरूरी क्यों है.  मैंने बताया तो वो समझ गयी शायद. नदी के किनारे हवा ठंडी थी. हम दोनों ही गीले कपड़ों में बहार खड़े थे.  
हम बोडो (आसाम की एक जनजाति) हैं.  एक बड़ा भाई था, जो उल्फा से जुड़ गया. और बाद में पुलिस के हाथों मारा गया. माँ - पिताजी को सदमा लगा. हमने आसाम छोड़ दिया. यहाँ मामा के पास आ गये. यह उनकी ही गाड़ी है. पिताजी कि हालत नहीं है कि कुछ करें. पेट तो पालना ही है न?
डर नहीं लगता? मैंने पूछा. यही क्यों चुना.?
नहीं. डरकर कौन जिया है आज तक. जो होगा देखा जायेगा. एक बार डरकर अपना घर आसाम छोड़ दिया. वो दर्द आज तक सालता है.
अब मेरे माँ बाप मेरी जिंदगी हैं. उनका बेटा मैं ही हूँ. 
मुस्कुराती है.
मैंने पीछे घूम कर देखा तो पिछली सीट पे बूढ़े बुढिया सोये पड़े थे. 
मैंने वापस सीट पर आ बैठा. उसने गाड़ी स्टार्ट कर ली. मैं बाहर देख रहा था. तीस्ता कितनी अविचल बह रही थी. 
और यह लड़की???
 

15 comments:

  1. wooooooooo...........super duper bro

    u have known nature at its best n its worst...

    but
    all happens for a purpose..

    this one really great and ye a bit more adventours,thriller..n a really nail biting one..

    hats off to neema ..a brave hearted girl
    doing a really grt job..+ a bit risky one.

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  2. Oh really..
    Nice story and the brave heart girl.

    ultimate story.

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  3. speechless.... truly amazing.....
    pta bhaiya, shratchandra, premchandra wgerah jitne clearly apne story characters ko outline krte the na, wese hi ap itna clear aur acha likhte ho k padh k maza aa jata h.....
    another amazing xperience..... njoyed...... :)

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  4. बहुत खूबसूरत और दिलचस्प कहानी. एक तरफ उस लड़की के होसले को देखा तो दूसरी तरफ आपका उस लड़की के प्रतिरूप में भगवान् पर विश्वास. दोनों पूरी रात बारिश में अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए. हम तो आपके शब्दों को पढ़ कर एक कैमरे से मन में मूवी बनाते चले गए. ऐसे ही जीते रहिये और हमारे मन को ऐसे ही छुते रहिये...:))

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  5. Namste bhaiya...
    mene pahala blog apka padha sach me maj aa gaya ab rojana padha karuga....
    apki life se seekhane ko bahut kuch hai.

    maja aa gaya bhaiya

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  6. Really nice, That girl and your way to convey it to us. shayad Tumhare man mein yeh prashn bhi aaya hoga ki main iske liye kyaa achchha kar sakta hoon? par duniya-daari aur us eeshwar kee ichchha jankar is prashn ko dabaana pada hoga?????

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  7. ohh man....dt girl is a soo tough.....hats off to her..
    very nyc experience.....


    reeli gud 1....

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  8. Nice One Neel Bro, the way u have delivered this incident is very interesting and tends to think over it...............

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  9. gr8 bhaiya....wat a exprnce....she is really a brave grl ....

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  10. Bhaiya ye sab to thik hai ...ye pata nhi chala ki jana jarurui kyun tha...???;))

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  11. sach me bhaiyya.....daring girl....i salute her..
    sahi bolti h vo....dar kr kaun zia h aajtak....jo hoga dekha jayega....


    rily a tough exp of yours....

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  12. Rahul Bhai kya likhte or yr aap m to bhut bda fan hu aapka aapke photo bhi bhut dekhta hu india real me na shi but aapke photo k jriye dekh leta hu

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